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Tuesday, 12 August 2025
भारतीय उपनिवेश के, दो राष्ट्रों में रूपांतरण का, मार्क्सवादी विश्लेषण
भारतीय उपनिवेश के, दो राष्ट्रों में रूपांतरण का, मार्क्सवादी विश्लेषण
मार्क्सवाद, समाज को लोगों के समूह के रूप में न देख कर, उन संबंधों के समुच्चय के रूप में देखता है जिन संबंधों के साथ वे लोग रह रहे होते हैं, और समझाता है कि जीवन के भौतिक आधार पर हर वर्ग विचारों का एक तिलस्म खड़ा कर लेता है जो उसके भौतिक आधार से पूरी तरह असंबद्ध नजर आता है। और यह समझ चेतना तथा अस्तित्व के द्वंद्वात्मक संबंध की समझ पर ही आधारित है।
भौतिक-सामाजिक-चेतना के दो भाग होते हैं, एक जो उत्पादन संबंधों के आधार पर विकसित होती है, और दूसरी जो रूढ़ियों तथा परंपरा के रूप में विरासत में मिलती है। सामंतवाद से पूंजीवाद में संक्रमण के साथ, सामाजिक चेतना में, जहाँ श्रेष्ठता के पाखंड का स्थान स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व की भावना ले लेती है, वहीं संपत्ति के निजी स्वामित्व की अवधारणा में कोई परिवर्तन नहीं होता है। भारतीय उपनिवेश पर जितनी मज़बूत पकड़ अंग्रेज़ी साम्राज्य रखना चाहता था, उतनी ही मज़बूत पकड़ भारत का कुलीन वर्ग तथा बुर्जुआ वर्ग भारतीय राष्ट्र राज्य पर रखना चाहता था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास और उपनिवेश का दो राष्ट्रों में रूपांतरण इतिहास की मार्क्सवादी समझ (ऐतिहासिक भौतिकवाद) को सत्यापित करता है।
राष्ट्रीयता एक सामूहिक सामाजिक चेतना है जो लोगों के भौतिक जीवन के साधनों के उत्पादन के दौरान विकसित होती है। जहाँ बुर्जुआ चिंतन राष्ट्रीयता को राष्ट्र राज्य के रूप में गठित राजसत्ता के संदर्भ से परिभाषित करता है, वहीं मार्क्सवाद राष्ट्रीयता को जीवन पद्धति के संदर्भ से परिभाषित करता है। मानव इतिहास एक निरंतर प्रक्रिया है और उसके किसी कालखंड को उसके अतीत से असंबद्ध कर के देखने के प्रयास के नतीजे गलत ही होंगे। राष्ट्र राज्य की अवधारणा पौने दो शताब्दी पुरानी है पर भारतीय उपमहाद्वीप पर मानव सभ्यता का इतिहास पचास शताब्दी से भी ज्यादा पुराना है। अनेकों विविधताओं वाले, अनेकों समूहों की, अनेकों राष्ट्रीयताओं वाले उपमहाद्वीप के निवासियों को, केवल धर्म के नाम पर, दो राष्ट्रों के रूप में देखना संकीर्ण मानसिकता है।
1857 से पहले, सामंतवादी उत्पादन संबंधोंके अनुरूप, वंशवादी संपत्ति संबंधों पर आधारित राजशाही के आधीन भारतीय उपमहाद्वीप का निम्न-मध्य वर्ग (बुर्जुआ वर्ग), उत्पादक वर्ग की भाँति, अपने आप को केवल प्रजा के रूप में ही देखता था जिसकी राजसत्ता में कोई भूमिका नहीं थी।
19वीं सदी के मध्य में, पूरे यूरोप में, औद्योगिक क्रांति और पूंजीवादी व्यवस्था के विकास के अनुरूप, बुर्जुआ वर्ग, राष्ट्रराज्य और राष्ट्रवाद की भावना के आधार पर आम जनता को अपने पीछे लामबंद कर राजशाही के खिलाफ बुर्जुआ जनवाद के लिए संघर्ष कर रहा था। इंग्लैंड की पार्लियामेंट 1857 के विद्रोह को भारत में स्वतंत्रता आंदोलन की पूर्व संध्या के रूप में देख रही थी इसलिए 1858 में विद्रोह को कुचलने के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने गवर्नमेंट अॉफ इंडिया एक्ट 1858 पारित कर भारतीय उपमहाद्वीप का साम्राज्य कंपनी के हाथ से अपने नियंत्रण में ले लिया और शासन व्यवस्था को बुर्जुआ जनवाद की प्रणाली के अनुरूप चलाने का निर्णय लिया। भारत के राजकुमारों, राजप्रमुखों तथा आमजन के नाम महारानी विक्टोरिया की घोषणा, जिसे 1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद में जनसभा में पढ़ा गया था, का एक प्रमुख अंश था,
“We hold ourselves bound to the Natives of Our Indian Territories by the same Obligations of Duty which bind Us to all Our other Subjects; and those Obligations, by the Blessing of Almighty God, We shall faithfully and conscientiously fulfil.”
भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रिटिश साम्राज्य का पूरा भूभाग तीन भागों में बंटा हुआ था।
ब्रिटिश इंडिया का शहरी क्षेत्र
शुरुआती दौर में मुख्य रूप से सामंतवादी चेतना, पर अंग्रेज़ी प्रशासन के अंग्रेजी अफसरों के संपर्क के कारण मध्यवर्ग के बीच निरंतर बढ़ती हुई अंग्रेजी बुर्जुआ चेतना की भी मौजूदगी। समय के साथ स्वतंत्रता आंदोलन का विकास और इसके साथ ही यूरोप के अनेकों देशों में विकसित हो रही विचारधाराओं के साथ संपर्क के कारण मध्यवर्ग के बीच अत्याधिक विकसित बुर्जुआ चेतना का विकास और साथ-साथ औद्योगिक विकास के कारण सर्वहारा चेतना का भी विकास।
2. ब्रिटिश इंडिया का ग्रामीण क्षेत्र
कृषि भूमि के सामूहिक सामंतवादी स्वामित्व का व्यक्तिगत बुर्जुआ स्वामित्व में रूपांतरण। मुख्य रूप से सामंतवादी चेतना, पर आजादी के आंदोलन का विस्तार और उसके कारण बुर्जुआ चेतना का भी विस्तार।
3. रियासतें
मुख्य रूप से सामंतवादी चेतना। रियासतों के प्रशासन में स्वायत्तता के कारण आजादी के आंदोलन की पहुंच लगभग नदारद थी और इस कारण सभी रियासतों में बुर्जुआ चेतना लगभग नदारद थी। पर दो रियासतों, जो सबसे बड़ी भी थीं - हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर - के शीर्ष नेतृत्व का अंग्रेज कुलीन वर्ग के साथ नज़दीकी संपर्क था जिसके कारण इनमें भी आजादी का आंदोलन ब्रिटिश इंडिया में विकसित हो रहे कांग्रेस के आजादी के आंदोलन के लगभग समांतर चल रहा था। एक में आंदोलन का नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टी कर रही थी और दूसरे में नेशनल कॉंफ़्रेंस कर रही थी। कुछ और रियासतों में भी स्थानीय पार्टियाँ रियासत के शासन में जनता के प्रतिनिधित्व की माँग उठाने लगी थीं।
अनेकों रियासतों/प्रांतों में बंटे सामंतवादी उपनिवेश का, एक बुर्जुआ जनवादी राष्ट्रराज्य में रूपांतरण ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा समय समय पर पारित क़ानूनों के द्वारा राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण हुआ था न कि उत्पादक शक्तियों के विकास के परिणाम स्वरूप। इस कारण आजादी के बाद दोनों ही राष्ट्रों (भारत और पाकिस्तान) में कहीं सामंतवादी चेतना प्रभावी नजर आयेगी और कहीं बुर्जुआ चेतना, सर्वहारा चेतना लगभग नदारद ही थी। ब्रिटिश जनवाद में राष्ट्र प्रमुख की नियुक्ति सामंतवादी चेतना के अनुरूप वंशानुगत और औपचारिक होती है। स्वतंत्र भारत में रियासतों के विलय के बाद भी काफी समय तक रियासत-प्रमुखों के प्रिवी पर्स तथा विशेषाधिकार वंशानुगत ही रहे। प्रिवी पर्स तथा विशेषाधिकार समाप्त कर दिये जाने के बाद आज भी सामंतवादी चेतना जनमानस में गहरे बैठी हुई है जिसके कारण देश में जनवादी चुनाव प्रणाली के बावजूद, बुर्जुआ राजनीतिक संगठनों में परिवारवाद का ही बोलबाला है।
ब्रिटिश पार्लियामेंट ने इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 के जरिए भारतीय उपनिवेश का शासन चलाना 1861 में ही शुरू कर दिया था जिसके जरिए पहली बार गवर्नर जनरल की काउंसिल में भारतीयों को नामांकन के जरिए शामिल किया गया था। समान अपराधिक दंड संहिता लागू करने में कोई समस्या नहीं थी पर समान नागरिक संहिता लागू करने में अनेकों बाधाएँ थीं। धार्मिक रूढ़ियां तथा सामाजिक परंपराएँ जनमानस में गहरी बैठी होती हैं और लंबे अरसे तक अभिग्य भौतिक-सामाजिक-चेतना का हिस्सा बनी रहती हैं। इनमें बदलाव की गति अत्याधिक धीमी होती है और उत्पादक शक्तियों के विकास तथा शिक्षा तथा संचार माध्यमों के विस्तार पर निर्भर करती है। इस कारण संपत्ति संबंधी नागरिक संहिता लागू करते समय हिंदू समुदायों, मुस्लिम समुदायों, सिख समुदायों, ईसाई समुदायों तथा आदिवासी समुदायों की धार्मिक तथा सामाजिक परंपराओं के लिए अलग अलग विशेष प्रावधान किये गये। देश में हिंदू तथा मुसलमानों की आबादी की तुलना में बाकी समुदायों की आबादी नगण्य थी (1872 की जनगणना के अनुसार हिंदू लगभग 75% तथा मुसलमान लगभग 20%)। कुछ प्रांतों में मुसलमान या तो बहुसंख्यक थे या लगभग बराबर थे। बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति में, हिंदुओं तथा मुसलमानों ने अपने अपने हितों (सजग स्तर पर धार्मिक तथा सामाजिक परंतु अभिज्ञ स्तर पर आर्थिक) की पूर्ति के लिए संगठित होना शुरू कर दिया। 1875 में हिंदुओं ने आर्य समाज का गठन किया तो मुसलमानों ने अलीगढ़ आंदोलन की नींव रखी।
जब तक आमजनता की शासन में कोई भागीदारी नहीं थी तब तक धार्मिक भेद-भाव व्यक्तिगत था और सांप्रदायिकता जैसी कोई चीज नहीं थी। पर बुर्जुआ जनवाद की आहट ने धार्मिक भेद-भाव को सार्वजनिक जीवन में ला दिया और संपन्न वर्ग द्वारा प्रतिनिधित्व के लिए मतदाताओं को धार्मिक आधार पर एकजुट करने के प्रयास ने सांप्रदायिकता को जन्म दिया।
जून 1906 में भारतीय मामलों के नये सचिव उदारवादी जॉन मोर्ले तथा कांग्रेस के अध्यक्ष (दिसंबर 1905-1906) उदारवादी गोखले के बीच सहमति बन गई थी कि काउंसिल के लिए प्रस्तावित सुधारों में चुने हुए भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रावधान रखा जायेगा। कांग्रेस में हिंदुओं के बहुमत को देखते हुए कट्टर धार्मिक मुसलमान कुलीनों ने मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के दावे के साथ ढाका में दिसंबर 1906 में मुस्लिम लीग का गठन कर लिया। 1909 में इंडियन काउंसिल एक्ट जिसे मोर्ले-मिन्टो रिफॉर्म के नाम से भी जाना जाता है, के जरिये केंद्रीय तथा प्रांतीय काउंसिलों में चुने हुए भारतीयों को शामिल करने का प्रावधान किया गया। इसके साथ ही सार्वजनिक दायरे में मुसलमान और हिंदू राष्ट्रीयताओं का अंतर्विरोध मुखर होने लगा। बुर्जुआवर्ग की, धर्मनिरपेक्ष उदारवादी सजग चेतना के बावजूद, अनभिज्ञ चेतना में धार्मिक रूढ़ियां तथा परंपराएँ लम्बे समय तक मौजूद बनी रहती हैं। जैसे-जैसे आर्थिक दायरे में संपन्न्नों तथा विपन्नों के बीच अंतर्विरोध तीव्र होने लगा वैसे-वैसे राजनीतिक दायरे में, संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र के साथ स्वराज की मांग करनेवाली हिंदू बहुमत वाली कांग्रेस, तथा मुसलिम राष्ट्रीयता की स्वायत्तता के साथ स्वराज की मांग करनेवाली मुस्लिम लीग के बीच अंतर्विरोध उग्र होने लगा।
28 दिसंबर 1885 को गठित की गई, 1905 से स्वतंत्रता आंदोलन में पदार्पण करने वाली, 1920 से स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर संभालने वाली और 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के भविष्य की जिम्मेदारी संभालने वाली कॉंग्रेस की सामूहिक चेतना के आंतरिक अंतर्विरोधों को, और स्थानीय तथा वैश्विक परिवेश के साथ उसके द्वंद्वात्मक संबंध को समझना भी जरूरी है।
उस दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंतर्विरोध, सामंतवादी उत्पादन संबंधों तथा बुर्जुआ उत्पादन संबंधों के बीच था। कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के अंदर स्वराज के एकाधिकारवादी स्वरूप की तथा संघीय स्वरूप की मांग का अंतर्द्वंद्व इसी अंतर्विरोध का प्रतिचित्रण था। मुसलमानों के तथा दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र या एक ही निर्वाचन क्षेत्र के अंदर सीटों के आरक्षण की व्यवस्था की माँगों के बीच का अंतर्द्वंद्व भी इसी अंतर्विरोध का प्रतिचित्रण ही था। भारतीय अर्थव्यवस्था आज भी अर्धसामंतवादी अर्धपूंजीवादी है और इसीलिए आज भी केंद्रीय सरकार तथा प्रांतीय सरकारों के बीच राज्य-व्यवस्था के एकाधिकारवादी स्वरूप तथा संघीय स्वरूप का अंतर्द्वंद्व प्रमुख अंतर्द्वंद्व है।
1858 के बाद ब्रिटिश पार्लियामेंट ने, बुर्जुआ सोच के अनुसार, ब्रिटिश इंडिया का शासन जनता की सीमित भागीदारी के साथ चलाने का निर्णय किया था। आर्थिक नीति स्पष्ट थी - भारतीय उपमहाद्वीप के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और उसके अनुषांगिक सीमित स्थानीय औद्योगीकरण।
केंद्रीय तथा प्रांतीय काउंसिलों में चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रावधान के कारण न केवल धार्मिक आधार पर, बल्कि क्षेत्रीय तथा भाषाई आधार पर भी समूह गठित होने लगे और विविध अंतर्विरोध मुखर होने लगे। कांग्रेस के आंतरिक अंतर्विरोध भी तीव्र होने लगे और गुटों में विभाजन के कारण आजादी के आंदोलन पर कांग्रेस की पकड़ कमजोर होने लगी। गोखले के नेतृत्व में उदारवादी गुट संवैधानिक तरीके से अंग्रेज़ों के सहयोग के साथ स्वराज की ओर बढ़ना चाहता था पर तिलक के नेतृत्व में उग्रवादी गुट आंदोलन के जरिए अंग्रेज़ी सरकार पर दबाव बनाना चाहता था। 1907 में सूरत अधिवेशन में कांग्रेस में विभाजन हो गया और उग्रवादी गुट कांग्रेस से अलग हो गया।
तुरंत ही अंग्रेज़ी सरकार ने तिलक को देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया और 1908 में छह साल की सज़ा देकर मांडले जेल में क़ैद कर दिया। तिलक की पैरवी मुहम्मद अली जिन्ना ने की जो 1904 से कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे, धर्मनिरपेक्ष थे और हिंदू-मुस्लिम एकता के तथा संवैधानिक तरीके से स्वराज के समर्थक थे। राष्ट्रीय आजादी के कांग्रेस के आंदोलन में जिन्ना की ख्याति को देखते हुए अनेकों मुस्लिम नेताओं ने उन्हें मुस्लिम लीग की बागडोर संभालने का आग्रह किया। इस शर्त पर कि, मुस्लिम लीग ऐसा कोई काम नहीं करेगी जिसका जिन्ना की आजादी के आंदोलन की अवधारणा से कोई टकराव हो, 1913 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग भी ज्वाइन कर ली। अप्रैल 1913 में गोखले के नेतृत्व में इंग्लैंड जानेवाले कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल में जिन्ना शामिल थे। गोखले ने जिन्ना के बारे में कहा था, “has true stuff in him, and that freedom from all sectarian prejudice which will make him the best ambassador of Hindu-Muslim Unity.” 1914 में लंदन जानेवाले कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व जिन्ना ने ही किया था जहाँ उनकी मुलाक़ात गांधी से हुई थी। उसी साल तिलक भी सज़ा पूरी कर वापस आ गये तथा उग्रवाद को छोड़कर उदारवाद के समर्थक हो गये और कांग्रेस की एकता की बात शुरू हो गई। इसी समय 1915 में गांधी साउथ अफ़्रीका से वापस आ गये। सर्वदेशक हिंदू सभा की घोषणा 1915 में हरिद्वार कुंभ मेले के अवसर पर की गई जिसमें महात्मा गांधी भी शामिल हुए थे। (1921 में इसका नाम बदल कर अखिल भारत हिंदू महासभा कर दिया गया।)
1916 में कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने लखनऊ में अपना अधिवेशन बुलाया। मुहम्मद अली जिन्ना दोनों के सदस्य थे और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए लखनऊ पैक्ट पर आमसहमति बनाने में सफल रहे। इस समझौते में मुसलमानों के लिए काउंसिल्स में एक तिहाई सीटों का तथा अलग निर्वाचन मंडल का प्रावधान रखा गया था। मदनमोहन मालवीय तथा हिंदू महासभा ने लखनऊ पैक्ट का विरोध किया। इसी सम्मेलन में तिलक अपने साथियों के साथ कांग्रेस में वापस आ गये और कांग्रेस ने पुन: आजादी के आंदोलन की बागडोर संभाल ली। शीघ्र ही, चम्पारन सत्याग्रह की सफलता के साथ ही, जनता के बीच तथा आंदोलन में सक्रिय अनेकों गुटों के बीच स्वीकार्यता बना कर गांधी ने कांग्रेस पर अपनी मज़बूत पकड़ बना ली।
एक राष्ट्रीय संगठन के रूप में कॉंग्रेस की मूलभूत चेतना उस दौर की उत्पादन व्यवस्था - सामंतवादी बुर्जुआ - के अनुरूप थी। कांग्रेस की राजनीतिक विचारधारा में व्यक्तिवादी तथा जनवादी, और धार्मिक रूढ़िवादी तथा सहिष्णु प्रगतिशील विचारों की मौजूदगी बराबर से रही है, और रणनीति प्रगतिशील से अधिक यथास्थितिवादी रही है। राष्ट्र-राज्य की अवधारणा प्रत्यक्ष रूप में बुर्जुआ जनवाद के अनुरूप संघीय गणराज्य की थी, पर परोक्ष में सामंती अधिनायकवाद के अनुरूप एकलस्वरूपी गणराज्य की थी।
बुर्जुआ जनवादी धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील धारा का प्रतिनिधित्व करनेवालों में मुहम्मद अली जिन्ना, पंडित मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस तथा जयप्रकाश जैसे नेता थे। सामंती अधिनायकवादी कट्टर धार्मिक रूढ़िवादी धारा का प्रतिनिधित्व करनेवालों में सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, गोविंद बल्लभ पंत जैसे नेता थे। अत्याधिक पिछड़ी पारंपरिक कृषि प्रधान सामंतवादी अर्थव्यवस्था वाले और रूढ़िवादी धार्मिक हिंदू बहुल आबादी वाले देश की आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करनेवाले एक संगठन के रूप में आंतरिक अंतर्विरोधी दोनों धाराओं के बीच संतुलन रखने तथा ब्रिटिश बुर्जुआ जनवाद के साथ सामंजस्य रखते हुए आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करने की अत्याधिक क्लिष्ट क्षमता रखने वाली कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिए, धार्मिक महात्मा गांधी सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति थे जो निजी जीवन में कट्टर धार्मिक सनातनी हिंदू थे पर राजनीतिक जीवन में सुविधानुसार धर्मनिरपेक्ष बुर्जुआ जनवादी यथास्थितिवादी व्यक्ति थे। स्वघोषित तौर पर वे सनातनी हिंदू थे इसलिए हिंदू आबादी के बीच स्वत: स्वीकार्य थे और धार्मिक सहिष्णुता के कारण उदारवादी मुसलमानों को भी स्वीकार्य थे। आंदोलन में सत्याग्रह तथा असहयोग की अपनी रणनीति के कारण वे पार्टी में उदारवादी और उग्रवादी दोनों गुटों को मान्य थे। देश में फैलाये जा रहे धार्मिक उन्माद और हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच बढ़ती वैमनस्यता से कांग्रेस की वैचारिक-सामाजिक-चेतना अछूती नहीं रह सकती थी। ऐसे में व्यक्तिगत रूप से पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष तथा राजनीतिक जीवन में स्पष्ट रूप से बुर्जुआ जनवादी प्रगतिशील मुहम्मदअली जिन्ना के लिए कांग्रेस में बने रह पाना असंभव था।
1920 में दो महत्वपूर्ण घटनायें हुईं जिसके कारण कांग्रेस के अंदर वैचारिक ध्रुवीकरण तीक्ष्ण हो गया जिसमें संतुलन सामंती अधिनायकवादी ताकतों के पक्ष में हो गया। कांग्रेस के अंदर, धार्मिक रूढ़िवादी हिंदुओं तथा उदारवादी हिंदू मुसलमान दोनों ने गांधी के नेतृत्व में, ऑटोमान साम्राज्य को दुनिया भर के मुसलमानों का खलीफा बनाये जाने के आंदोलन का समर्थन करने का तथा मोंटेगू-चेम्सफोर्ड सुधारों का विरोध करने के लिए असहयोग आंदोलन करने का फैसला किया।
धर्म निरपेक्ष जिन्ना कांग्रेस द्वारा खलीफत आंदोलन का समर्थन करने के हक़ में नहीं थे। उनका मत था कि खलीफत आंदोलन भारत में कट्टर मुसलमानों को ताक़त देगा और साथ ही हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को तेज़ कर कट्टर हिंदुओं को भी ताक़त देगा जो हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए घातक होगा। जिन्ना असहयोग आंदोलन के भी पक्ष में नहीं थे। उनका मत था कि असहयोग आंदोलन अराजकता को जन्म देगा जो सरकार को दमन का अवसर देगा और फलस्वरूप जनआंदोलन को कमजोर करेगा। गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस की हिंदू तथा मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति और अनेकों कांग्रेसी नेताओं की हिंदू महासभा के साथ बढ़ती नज़दीकियों के कारण धर्मनिरपेक्ष जिन्ना कांग्रेस में अलग-थलग पड़ गये थे। कांग्रेस के 1920 के नागपुर अधिवेशन में जिन्ना के खिलाफ नारेबाज़ी की गई और उन्हें अपनी बात रखने का मौक़ा नहीं दिया गया, और इस अधिवेशन के साथ ही उन्होंने कांग्रेस को अलविदा कह दिया।
1922 में ऑटोमान साम्राज्य की समाप्ति और प्रगतिशील कमाल अतातुर्क द्वारा तुर्की को गणराज्य घोषित किये जाने के बाद खलीफत आंदोलन समाप्त हो गया। 1922 में ही चौरीचौरा कांड के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। उसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने दमन चक्र चलाया और अनेकों कांग्रेसी नेताओं को जेल में बंद कर दिया। आंदोलन वापस लेने से क्षुब्ध और हताश अनेकों नौजवानों ने हिंसक आंदोलन की राह पकड़ ली। 1920 में कांग्रेस द्वारा लिए गये दोनों निर्णयों पर, जिन्होंने न केवल आजादी के आंदोलन को बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रयासों को भी अपूरणीय क्षति पहुँचाई, जिन्ना की आशंका सही साबित हुई।
4 फरवरी 1922 चौरीचौरा कांड के कारण गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने से नाराज़ होकर अतिवादियों ने कांग्रेस को छोड़कर लाला हरदयाल और रामप्रसाद बिस्मिल की अगुआई में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन का गठन किया जिसके नाम में, भगतसिंह के आने के बाद, सोशलिस्ट शब्द भी जोड़ दिया गया। उदारवादियों ने भी मोतीलाल नेहरू तथा चितरंजन दास के नेतृत्व में कांग्रेस को छोड़कर स्वराज पार्टी का गठन किया जिसे कुछ साल बाद भंग कर दिया गया। परंतु जवाहरलाल नेहरू के प्रतिनिधित्व में बुर्जुआ जनवादी तत्वों ने तथा सरदार पटेल के प्रतिनिधत्व में सामंती अधिनायकवादी तत्वों ने, महात्मा गांधी के नेतृत्व में मध्यमार्गीय विचारधारा तथा अंग्रेज़ों के साथ दोस्ताना संघर्ष की नीति का ही साथ दिया और कांग्रेस ने कमजोर पड़ चुके आजादी के आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में थामे रखी। मार्च 1926 में मोतीलाल पुन: कॉंग्रेस में वापस आ गये।
बीसवीं सदी के बीस के दशक तक आते आते कांग्रेस के अंदर तीन विचारधाराओं - कट्टर धार्मिक सामंती अधिनायकवादी, उदार धर्मनिरपेक्ष बुर्जुआ जनवादी और रूसी समाजवाद से अधिक फ़्रांसीसी समाजवाद से प्रभावित समाजवादी - के बीच वर्चस्व का संघर्ष अपने चरम पर पहुंच चुका था। तीस के दशक तक आते आते स्वभाविक रूप से कट्टर मुसलमान मुस्लिम लीग के रूप में तथा कट्टर समाजवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में कांग्रेस से बाहर हो गये और तीनों धाराओं के उदारवादी कांग्रेस में ही रह गये। कांग्रेस में हिंदुओं के बहुमत के कारण, कट्टर हिंदूवादियों के द्वारा हिंदूमहासभा के गठन के बावजूद अनेकों कट्टर हिंदूवादी कांग्रेस में ही बने रहे। सौ साल के इतिहास में कांग्रेस सुविधानुसार अलग अलग समय पर तीनों धाराओं के प्रतिनिधियों को संतुष्ट करने के लिए निर्णय लेती रही है पर राजसत्ता के अधिनायकवादी चरित्र के अनुरूप, सत्ता के विकेंद्रीकरण से अधिक केंद्रीकरण के लिए, और राष्ट्र के गठन में संघीय (Federal) से अधिक एकल स्वरूप (Unitary) के लिए प्रयासरत रही है।
नेहरू पिता-पुत्र की आजादी के आंदोलन में सक्रिय सहभागिता और पिता-पुत्री की आजादी के आंदोलन में तथा भारतीय गणराज्य के गठन व आर्थिक विकास में सहभागिता के कारण, नेहरू-गांधी परिवार की पारिवारिक चेतना कांग्रेस की सामूहिक चेतना के साथ एकीकृत हो गई है। परिवार और पार्टी की बुर्जुआ जनवाद के लिए प्रतिबद्धता निर्विवाद है। यदा-कदा अनेकों भटकावों के बावजूद, नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों का परिवार के साथ द्वंद्वात्मक संबंध तथा परिवार का कांग्रेस के साथ द्वंद्वात्मक संबंध इस प्रतिबद्धता को सुनिश्चित करता रहता है। अनेकों बार नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व के बावजूद कांग्रेस के अंदर मौजूद सामंतवादी चेतना के दबाव में कुछ प्रतिगामी फ़ैसले लिए गये पर पर अंतत: दिशा बुर्जुआ जनवादी प्रगतिशील ही रही।
ठहरे हुए रिश्तों को गति देने और मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच की खाई को पाटने के लिए ताकि वे नए संविधान का प्रारूप अंग्रेजों के सामने पेश कर सकें, जिन्ना की अध्यक्षता में कई गणमान्य मुसलमानों ने 20 मार्च 1927 को दिल्ली में बैठक की और आजाद भारत में मुसलमानों की भागीदारी की रूप-रेखा तैयार करने के लिए ‘मुस्लिम प्रपोज़ल’ तैयार किया जिसमें सिंध को अलग प्रांत बनाने का प्रस्ताव भी था।। जिन्ना जानते थे कि मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच सबसे बड़ा विवाद मतदाताओं का मामला था। कांग्रेस के प्रमुख नेता संयुक्त निर्वाचक मंडल की पैरवी कर रहे थे क्योंकि उनके अनुसार पृथक निर्वाचक मंडल भारतीय राष्ट्रवाद की नींव को कमजोर कर देता। जबकि मुस्लिम लीग, अपने कमजोर प्रतिनिधित्व के चलते मुसलमानों की सुरक्षा के लिए चिंतित, अलग निर्वाचक मंडल की अपनी मांग को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी। जिन्ना और उनकी टीम ने महसूस किया कि वे कांग्रेस को एक साझा एजेंडे को स्वीकार करने के लिए तभी राजी कर सकते हैं जब वे लीग की पृथक निर्वाचक मंडल की मांग को वापस ले लें। उन्होंने चर्चा की और उन शर्तों को निर्धारित करने का प्रयास किया जिनके साथ संयुक्त निर्वाचन प्रणाली को स्वीकार किया जा सकता था। लंबी चर्चा के बाद सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि लीग को कुछ प्रस्तावों के आधार पर कांग्रेस के साथ एक समझौते को स्वीकार करना चाहिए; प्रस्तावित समझौते को दिल्ली प्रस्तावों के रूप में जाना जाने लगा। यह प्रपोज़ल कांग्रेस को भेज दिया गया था और कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने इस प्रपोज़ल की सराहना की और हिंदू-मुस्लिम नेताओं से विचार-विमर्श के लिए एक सब-कमेटी का गठन किया। 15 से 18 मई 1927 को बंबई अधिवेशन में ‘मुस्लिम प्रपोज़ल’ के आधार पर वर्किंग कमेटी ने विस्तृत प्रस्ताव पारित किया जिसका अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने उसी समय अनुमोदन कर दिया था। ‘मुस्लिम प्रपोज़ल’ में ये माँगें थीं,
1. सिंध को बंबई से अलग कर एक स्वतंत्र प्रांत के रूप में गठित किया जाना चाहिए।
2. उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत और बलूचिस्तान में सुधारों को भारत के किसी भी अन्य प्रांत की तरह ही पेश किया जाना चाहिए।
3. जब तक और जब तक उपरोक्त प्रस्तावों को लागू नहीं किया जाता, तब तक मुसलमान अलग निर्वाचक मंडल के माध्यम से अपने प्रतिनिधित्व के अधिकार का त्याग नहीं करेंगे। मुस्लिम अलग-अलग समुदायों की आबादी के अनुपात में निर्धारित सीटों के आरक्षण के साथ संयुक्त निर्वाचक मंडल के पक्ष में अलग निर्वाचक मंडल की मांग को छोड़ने के लिए तैयार होंगे, यदि उपरोक्त दो प्रस्तावों को मुसलमानों की पूर्ण संतुष्टि के लिए लागू किया गया। इसके साथ ही निम्नलिखित प्रस्ताव भी स्वीकार किये जाने चाहिए।
4. सिंध, बलूचिस्तान और NWFP में हिंदू अल्पसंख्यकों को सीटों के आरक्षण के रूप में उतनी ही रियायतें दी जाएंगी, जितनी मुस्लिमों को उनकी आबादी के अनुपात में हिंदू बहुसंख्यक प्रांतों में मिलेंगीं। पंजाब और बंगाल में विभिन्न समुदायों के लिए जनसंख्या के अनुसार सीटों का आरक्षण किया जाना चाहिए।
5. मुसलमानों को केंद्रीय विधानमंडल में दिया जाने वाला प्रतिनिधित्व 1/3 से कम नहीं होना चाहिए।
6. धार्मिक स्वतंत्रता जैसे प्रावधानों के अतिरिक्त, संविधान में एक और गारंटी होनी चाहिए कि सांप्रदायिक मामलों पर किसी भी विधेयक या प्रस्ताव पर विचार या उसे पारित नहीं किया जाएगा यदि संबंधित समुदाय के सदस्यों का तीन-चौथाई बहुमत इसका विरोध करता है।
हालांकि मुस्लिम लीग इन प्रस्तावों के कारण विभाजित थी और मुस्लिम लीग के कुछ कट्टर नेताओं ने, मुख्य रूप से पंजाब से, सर मुहम्मद शफी के नेतृत्व में, जिन्ना समूह से अलग होने का फैसला कर लिया।
बढ़ती हुई वामपंथी गतिविधियों ने अंग्रेज़ी सरकार की नींद उड़ा दी थी, और अंग्रेज़ी सरकार ने 10 साल पूरे होने का इंतज़ार न कर, ज़िम्मेदार सरकार की संभावना का आंकलन करने के लिए नवंबर 1927 में साइमन कमीशन का गठन कर दिया जो 3 फरवरी 1928 को बंबई पहुंच गया। कमीशन में किसी भी भारतीय के शामिल न किये जाने से अनेकों आंदोलनकारी तथा क्रांतिकारी नाराज़ थे। गांधी और जवाहरलाल नेहरू की अगुआई में कॉंग्रेस ने तथा जिन्ना की अगुआई में मुस्लिम लीग ने साइमन कमीशन के बहिष्कार की घोषणा कर दी, पर अंबेडकर, हिंदू महासभा, सेंट्रल सिख लीग तथा मुस्लिम लीग के एक गुट ने समर्थन करने का निर्णय किया। भारतीय मामलों के मंत्री लॉर्ड बिरकेनहैड ने भारतीयों को चुनौती दी थी कि अगर कर सकते हैं तो संवैधानिक सुधारों के लिए वे अपना स्वयं का प्रस्ताव तैयार करें।
दिसंबर 1927 में कॉंग्रेस ने मद्रास सम्मेलन में साइमन कमीशन का बायकॉट करने का प्रस्ताव पारित कर ऑल पार्टी कॉंफ़्रेंस बुलाकर नये संविधान की रूप रेखा तैयार करने के लिए समिति गठन करने का फ़ैसला किया। ऑल पार्टी कॉंफ़्रेंस में हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग, सेंट्रल सिख लीग, इंडियन स्टेट्स पीपुल्स कॉंफ़्रेंस, एआईटीयूसी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ बांबे और अवध, आगरा, बंगाल, बिहार तथा मद्रास के ज़मींदारों के संघ को भी शामिल किया गया था।
आम जनता के बीच क्रांतिकारियों की लोकप्रियता तथा पूर्ण स्वराज की मांग बढ़ती जा रही थी। कांग्रेस के अंदर बुर्जुआ जनवादी चाहते थे कि पूर्ण स्वराज के आधार पर संविधान की रूपरेखा बने, पर सामंती अधिनायकवादी किसी न किसी रूप में राजसत्ता पर अंग्रेज़ों का नियंत्रण चाहते थे। गांधी जी ने सुझाव दिया कि फ़िलहाल डोमिनियन राज की मांग की जाये और अगर अंग्रेज़ इस मांग को दो साल के भीतर पूरी नहीं करते हैं तो फिर पूर्ण स्वराज की मांग की जाये।
ऑल पार्टी कॉन्फ़्रेन्स की पहली मीटिंग दिल्ली में 12-22 फ़रवरी 1928 को हुई। इस मीटिंग में सबसे पहले कांस्टीट्यूशन की रूपरेखा पर चर्चा हुई। कुछ सदस्यों का कहना था कि 1921 के कांग्रेस के सम्मेलन में पहले भी पूर्ण स्वराज्य के लिए मांग उठ चुकी थी, परंतु बहुतों का सोचना था कि अंग्रेज़ी सरकार इसके लिए तैयार नहीं होगी इसलिए समिति ने कनाडा तथा ऑस्ट्रेलिया की तर्ज़ पर डोमिनियन स्टेटस के आधार पर कांस्टीट्यूशन बनाये जाने का सुझाव रिपोर्ट में शामिल किया।
कॉन्फ़्रेंस की 8-11 मार्च 1928 की मीटिंग में सांप्रदायिक मसले पर गहरी चर्चा हुई और यह पाया गया कि सिंध के विभाजन तथा अल्पसंख्यकों के लिए सीटों के आरक्षण पर मुस्लिम लीग तथा हिंदू महासभा के बीच कोई सहमति नहीं है। आरक्षण के मुद्दे पर सिखों को भी घोर आपत्ति थी। दोनों मुद्दों पर अलग-अलग विचार के लिए दो समितियों का गठन कर दिया गया। अप्रैल 1928 में हिंदू महासभा ने अपने जबलपुर अधिवेशन में ‘मुस्लिम प्रपोज़ल’ के कई प्रावधानों पर आपत्ति दर्ज करते हुए प्रस्ताव पारित किया। 19 मई 1928 को ऑल पार्टी कॉंफ़्रेंस ने बंबई में अपनी मीटिंग में नया संविधान तैयार करने के लिए मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में कमेटी का गठन किया जिसमें सुभाष चंद्र बोस तथा जवाहरलाल नेहरू, जिन्हें समिति का सचिव नामित किया गया था, भी शामिल थे। कमेटी ने 10 अगस्त 1928 को अपनी रिपोर्ट कॉन्फ़्रेंस के सामने पेश कर दी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा -
* ‘इस प्रकार जब 19 मई 1928 को बंबई में फिर से सर्वदलीय सम्मेलन की बैठक हुई तो स्थिति आशाजनक नहीं थी। साम्प्रदायिक संगठनों के बीच दूरी और भी बढ़ गई थी और उनमें से प्रत्येक ने अपने रवैये में कठोरता ला दी थी और कोई भी इसे बदलने या संशोधित करने के लिए तैयार नहीं था। सिंध और आनुपातिक प्रतिनिधित्व पर दिल्ली में नियुक्त दो उप-समितियों ने कोई रिपोर्ट पेश नहीं की थी।’
* ‘लेकिन जब हम पाते हैं कि मद्रास कांग्रेस और मुस्लिम लीग का दृष्टिकोण हिंदू महासभा और सिख लीग के बिल्कुल विपरीत है, तो दोनों में से किसी को भी पूरी तरह से स्वीकार करने में हमें सम्मानपूर्वक अपनी असमर्थता व्यक्त करनी चाहिए।'
* ‘इसलिए प्रतिनिधित्व की किसी भी तर्कसंगत प्रणाली के लिए एक शर्त के रूप में अलग निर्वाचक मंडल को पूरी तरह से खारिज कर दिया जाना चाहिए। हम केवल संयुक्त या मिश्रित निर्वाचक मंडल रख सकते हैं।’
* ‘सिंध में बड़ी संख्या में मुसलमान रहते हैं। एक नया प्रांत बनाया जाए या नहीं, सिंध को मुख्य रूप से मुस्लिम क्षेत्र बना रहना चाहिए। और अगर इस विशाल बहुमत की इच्छा नहीं मानी जाती है, तो यह न केवल आत्मनिर्णय के सिद्धांत की हत्या करना होगा, बल्कि इसका परिणाम उस बहुसंख्यक आबादी को नाराज करना होगा। शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण ढंग से प्रगति करते हुए स्वतंत्र भारत की चाह रखने वाला कोई भी भारतीय इस परिणाम को अलग नजर से नहीं देख सकता है। राष्ट्रवाद के व्यापक दृष्टिकोण से यह कहना कि कोई "सांप्रदायिक" प्रांत नहीं बनाया जाना चाहिए, एक तरह से, अभी भी व्यापक अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से, यह कहने के बराबर है कि कोई अलग राष्ट्र नहीं होना चाहिए। इन दोनों बयानों में कुछ हद तक सच्चाई है लेकिन कट्टरतम अंतर्राष्ट्रीयतावादी मानते हैं कि पूर्ण राष्ट्रीय स्वायत्तता के बिना अंतर्राष्ट्रीय राज्य का निर्माण असाधारण रूप से कठिन है। इसी तरह पूर्ण सांस्कृतिक स्वायत्तता और सांप्रदायिकता के बिना, इसके बेहतर पहलू में संस्कृति है, एक सामंजस्यपूर्ण राष्ट्र बनाना मुश्किल होगा।’
* ‘हमें संदेह है कि अलगाव का वास्तविक विरोध किसी उच्च राष्ट्रीय विचारों के कारण नहीं है, बल्कि आर्थिक विचारों के कारण है; हिंदुओं के इस डर से कि अगर मुसलमानों के पास अलग क्षेत्र में मामलों का प्रभार होगा तो उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो सकती थी।’
* ‘हर कोई साम्प्रदायिक भावना पर पछताता है और उसे राजनीति के शरीर से उखाड़ फेंकना चाहता है। लेकिन यह स्पष्ट है कि यह केवल एकता की बात करने और पवित्र बातों में लिप्त होने से नहीं चल सकता है जो हमें कहीं नहीं ले जाती है। साम्प्रदायिकता तभी जा सकती है जब लोगों का ध्यान अन्य चैनलों की ओर निर्देशित किया जाता है, जब वे उन सवालों में दिलचस्पी लेने लगते हैं जो समाज के कृत्रिम विभाजन पर आधारित काल्पनिक भय के बजाय वास्तव में उनके दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं।’
* ‘हम यह कहकर स्वयं को संतुष्ट करते हैं कि (जबकि) हम मानते हैं कि एक भारतीय संघ, जो कि स्थानीय इकाइयों में अधिकतम स्वायत्तता के साथ संगत होगा, चाहे प्रांत हों या राज्य, जिम्मेदार सरकार के लिए एकमात्र ठोस आधार हो सकता है।’
* ‘ऐसा करने में यह स्पष्ट है कि हमारी पहली सावधानी यह होनी चाहिए कि हमारे मौलिक अधिकारों की गारंटी इस प्रकार हो कि किसी भी परिस्थिति में उन्हें वापस लेने की अनुमति न हो, अल्प संख्यकों और मजलूमों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए।’
* ‘हमने केंद्रीय और प्रांतीय विधानमंडल दोनों के किसी भी विषय में समवर्ती शक्तियों का प्रावधान नहीं किया है। इससे घर्षण होने की संभावना है और इसलिए हमने दोनों के कार्यों को बिना किसी ओवरलैपिंग के पूरी तरह से अलग-अलग खांचों में रखने का प्रयास किया है।’
इस बीच मुस्लिम लीग की कॉउंसिल ने तय किया कि अगर मुस्लिम प्रपोज़ल को पूरी तरह लागू नहीं किया जाता है तो तैयार किये जा रहे कांस्टीट्यूशन पर सहमति देने के पहले उन्हें लीग से सलाह करनी होगी। इन प्रस्तावों को पूर्ण रूप से स्वीकार या अस्वीकार किया जाना था। पृथक निर्वाचक मंडल के अधिकार का त्याग मुसलमानों द्वारा एक अभूतपूर्व रियायत थी और जिन्ना की यह एक बड़ी उपलब्धि थी कि उन्होंने अपने सहयोगियों को इसे स्वीकार करने के लिए मना लिया था। यह पहली बार था जब मुस्लिम लीग संयुक्त निर्वाचन मंडल के लिए सहमत हुई थी। पर हिंदू महासभा के तथा कांग्रेस के अंदर ही सामंती अधिनायकवादियों के विरोध के कारण इन माँगों को मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट की सिफारिशों में शामिल नहीं किया गया। कमेटी में मुस्लिम लीग के सदस्यों ने रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं किये। इसके बाद भविष्य में मुस्लिम लीग कभी भी पृथक निर्वाचन मंडल की मांग छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुई।
नेहरू कमेटी की रिपोर्ट पर चर्चा और अनुमोदन के लिए दिसंबर 1928 में कॉंफ़्रेंस की मीटिंग बुलाई गई। जिन्ना ने एक बार फिर हिंदू-मुस्लिम खाई को पाटने का प्रयास करते हुए रिपोर्ट में निम्न संशोधन सुझाये।
1. केंद्रीय विधायिकाओं में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व एक तिहाई से कम न हो। (रिपोर्ट में एक चौथाई का अनुमोदन किया गया था।)
2. अगर सार्विक वयस्क मताधिकार स्वीकार नहीं किया जाता है तो पंजाब तथा बंगाल में मुसलमानों के लिए आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित की जायें। (रिपोर्ट मे पंजाब तथा बंगाल में किसी भी प्रकार के आरक्षण को नकार दिया गया था क्योंकि सार्विक वयस्क मताधिकार का प्रस्ताव रखा गया था।)
3. संविधान का स्वरूप संघीय हो और अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों के पास हों। (रिपोर्ट में अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास रखी गईं थीं।)
4. सिंध को तुरंत अलग प्रांत बनाया जाये तथा नॉर्थ वेस्ट फ़्रंटियर प्रॉविंस तथा बलूचिस्तान में जल्दी से जल्दी सुधार लागू किये जायें। (रिपोर्ट में सिंध को अलग प्रांत बनाये जाने से पहले वित्तीय आंकलन किये जाने का प्रावधान रखा गया था।)
रिपोर्ट में रियासतों की स्वायत्तता को बराकर रखा गया था;
‘The Commonwealth shall exercise the same rights in relation to, and discharge the same obligations towards, the Indian States, arising out of treaties or otherwise, as the Government of India has hitherto exercised and discharged’
तथा संगठनात्मक ढाँचे की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा गया था कि भारतीय संघ, जो कि स्थानीय इकाइयों में अधिकतम स्वायत्तता के साथ संगत होगा, चाहे प्रांत हों या राज्य, जिम्मेदार सरकार के लिए एकमात्र ठोस आधार हो सकता है, इसके बावजूद समिति ने एकलस्वरूप डोमीनियन का प्रस्ताव रखा था।
“डोमिनियन ..... जिसकी संसद को भारत की शांति, व्यवस्था और अच्छे शासन के लिए कानून बनाने की शक्तियां हों, और उस संसद के लिए जिम्मेदार एक कार्यपालिका हो, और इसे भारतीय राष्ट्रमंडल के रूप में जाना जाएगा। .... यह अधिनियम और राष्ट्रमंडल की संसद द्वारा इसके तहत बनाए गए सभी अधिनियम प्रत्येक प्रांत और राष्ट्रमंडल के प्रत्येक भाग की अदालतों और लोगों पर बाध्यकारी होंगे।”
तीव्र आंतरिक मतभेदों के बावजूद कांग्रेस मोतीलाल नेहरू कमेटी की सिफारिशों को देश की ओर से, ऑल पार्टी कॉन्फ़्रेंस द्वारा अनुमोदित प्रस्तावित संविधान के रूप में पेश करने में सफल रही। नेहरू कमेटी ने रेखांकित किया था कि पूर्ण स्वायत्तता के बिना एक सामंजस्यपूर्ण राष्ट्र बनाना मुश्किल होगा, पर समवर्ती शक्तियों के प्रावधान को खारिज करने के बावजूद प्रस्तावित संविधान के प्रारूप में, केंद्रीय प्रतिनिधि सभा द्वारा बनाये गये क़ानूनों का सारे राष्ट्र में प्रभावी होने की शर्त रखा जाना दर्शाता है कि कांग्रेस तथा अन्य समूहों की चेतना में सामंती अधिनायकवादी विचार का बर्चस्व था और बुर्जुआ जनवादी सोच अल्पमत में थी। स्वतंत्रता आंदोलन का आगे का इतिहास इस बात को सत्यापित करता है कि हिंदू बहुल आबादी के बीच अल्पसंख्यक मुसलमानों की सुरक्षा के लिए, मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग की पृथक निर्वाचन मंडल और अवशिष्ट शक्तियों के साथ स्वायत्त प्रांतों की मांग निराधार नहीं थी।
जहाँ कांग्रेस सामंती तथा बुर्जुआ हितों को साधते हुए, गांधी के नेतृत्व में मध्यमार्गीय नीति अपनाकर, अहिंसक आंदोलन तथा अंग्रेज़ी हुकूमत के साथ समझौते करते हुए आगे बढ़ रही थी वहीं अनेकों निम्न मध्यवर्गीय, चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों को आगे रख कर, मजदूरवर्ग के नेतृत्व के साथ आजादी के आंदोलन को वामपंथी दिशा देने का प्रयास कर रहे थे। गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू करने और फिर चौरीचौरा कांड के बाद उसे वापस लेने के कारण कांग्रेस की और गांधी की विश्वसनीयता कमजोर हो गई थी। एक ओर जिन्ना के कांग्रेस छोड़ देने से कांग्रेस में मुस्लिम जनवादियों की स्थिति कमजोर हो गई थी और मुस्लिम लीग से दूरी बढ़ गई थी, दूसरी ओर उग्रवादियों द्वारा कॉंग्रेस छोड़कर एचआरए बना लेने के बाद काकोरी कांड, सांडर्स हत्याकांड, केंद्रीय असेंबली में बमकांड आदि के कारण क्रांतिकारियों की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही थी। ऐसे में मार्च-अप्रैल 1930 में डाँडी मार्च के जरिए गांधी ने कांग्रेस को फिर से आजादी के आंदोलन के केंद्र में ला दिया।
1930 का दशक अंग्रेज़ी सरकार के लिए अत्याधिक कठिन उथल पुथल का दौर था। 1929-1939 वैश्विक मंदी का दौर था। औद्योगिक उत्पादन निम्नतम स्तर पर पहुंच गया था बेरोजगारी चरम पर थी। ऐसे में उपनिवेशों में विद्रोह तीव्र होने लगे थे। अंग्रेज़ी साम्राज्य के राजनीतिक-आर्थिक अंतर्विरोधों के समाधान के लिए इंग्लैंड में राजनीतिक पार्टियों ने आपसी मतभेदों को दरकिनार करते हुए राष्ट्रीय सरकार के गठन का निर्णय किया। सबसे बड़े उपनिवेश भारत में आजादी का आंदोलन उग्र हो चला था और उसके वामपंथी क्रांति की ओर मुड़ जाने का ख़तरा मँडरा रहा था।
भारत में जिम्मेदार सरकार के गठन के लिए नेहरू कमेटी की रिपोर्ट और साइमन कमेटी की रिपोर्ट के अनेकों सुझावों से अलग-अलग समूहों की असहमति को देखते हुए इंग्लैंड में गोल मेज़ कॉंफ़्रेंस का आयोजन किया गया।
असहयोग आंदोलन के चलते अधिकांश कांग्रेसी नेता जेलों में बंद थे इसलिए पहली गोल मेज़ कॉंफ़्रेंस में कांग्रेस का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं हुआ। गांधी-इरविन समझौते के बाद कांग्रेस की ओर से गांधी दूसरी गोल मेज़ कॉंफ़्रेंस में शामिल हुए। अंग्रेज़ी सम्राट की ओर से ब्रिटेन की तीनों मुख्य राजनीतिक पार्टियाँ शामिल हुईं, भारतीय रियासतों की ओर से अनेकों राजा शामिल हुए और ब्रिटिश इंडिया की ओर से अम्बेडकर, तेज़ बहादुर सप्रू और आगा खान शामिल हुए।
तीनों बड़े समूहों, कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा रियासतों के प्रतिनिधियों के बीच प्रांतों की स्वायत्तता तथा केंद्र सरकार के एकाधिकार को लेकर मौलिक अंतर्विरोध थे। तीन चरणों में आयोजित की गई तीनों कॉंफ्रेंसों में नये डोमीनियन तथा संविधान की रूपरेखा पर कोई सहमति नहीं बन पाई सिवाय इसके कि डोमीनियन का स्वरूप एकलस्वरूप न होकर संघठनात्मक होगा।
29 दिसंबर 1930 को अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के 25वें सम्मेलन में, इलाहाबाद में अपने अध्यक्षीय भाषण में मुहम्मद इकबाल ने कहा था,
“इस्लाम ने उन बुनियादी भावनाओं और निष्ठाओं को सुसज्जित किया है जो धीरे-धीरे बिखरे हुए व्यक्तियों और समूहों को एकजुट करती हैं, और अंततः उन्हें एक अच्छी तरह से परिभाषित लोगों में बदल देती हैं, जिनके पास स्वयं की नैतिक चेतना होती है। वास्तव में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत शायद दुनिया में एकमात्र ऐसा देश है जहां इस्लाम ने जन-निर्माण शक्ति के रूप में अपना सर्वश्रेष्ठ काम किया है।”
“मनुष्य न तो अपनी जाति से, न अपने धर्म से, न नदियों के प्रवाह से, न पर्वत श्रृंखलाओं से गुलाम होता है। दिमाग से समझदार और ज़िन्दा दिल लोगों का एक बड़ा समूह, एक नैतिक चेतना बनाता है जिसे राष्ट्र कहा जाता है। ऐसा राष्ट्र बनाना संभव है, हालांकि इसमें लोगों को व्यावहारिक तौर पर नया रूप देने और उन्हें नए भावनात्मक अंत:करण से सुसज्जित करने की लंबी और कठिन प्रक्रिया शामिल है। यह भारत में एक सच्चाई हो सकती थी यदि कबीर की शिक्षा और अकबर की ईश्वरीय आस्था ने इस देश की जनता की कल्पना में घर कर लिया होता। हालाँकि, अनुभव से पता चलता है कि भारत में विभिन्न जाति इकाइयों और धार्मिक इकाइयों ने अपने-अपने घटक को एक बड़े समग्र में समाहित करने की कोई प्रवृत्ति नहीं दिखाई है। प्रत्येक समूह को अपने सामूहिक अस्तित्व से अत्यंत ईर्ष्या होती है। उस प्रकार की नैतिक चेतना का निर्माण, जो एक राष्ट्र का सार है, एक ऐसी कीमत की मांग करती है जिसे भारत के लोग चुकाने के लिए तैयार नहीं हैं। इसलिए, भारतीय राष्ट्र की एकता को नकार में नहीं, बल्कि कई लोगों के आपसी सद्भाव और सहयोग में खोजा जाना चाहिए।”
“शायद हम एक-दूसरे के इरादों पर संदेह करते हैं और अंदर ही अंदर एक-दूसरे पर हावी होने का लक्ष्य रखते हैं। शायद, आपसी सहयोग के उच्च हितों में, हम उस एकाधिकार को छोड़ने का जोखिम नहीं उठा पाते हैं जो परिस्थितियों ने हमारे हाथों में दे दिया है, और इस प्रकार हम अपने अहंकार को राष्ट्रवाद की आड़ में छिपाते हैं, बाहरी तौर पर बड़े दिल वाली देशभक्ति का, लेकिन अंदर से किसी जाति या जनजाति की तरह संकीर्ण सोच वाला। शायद हम यह मानने को तैयार नहीं हैं कि प्रत्येक समूह को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार मुक्त विकास का अधिकार है। लेकिन हमारी असफलता का कारण चाहे जो भी हो, मैं अब भी आशान्वित महसूस करता हूं। ऐसा प्रतीत होता है कि घटनाएँ किसी प्रकार के आंतरिक सामंजस्य की ओर बढ़ रही हैं। और जहां तक मैं मुस्लिम मन को पढ़ने में सक्षम हूं, मुझे यह घोषित करने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि यदि यह सिद्धांत, कि भारतीय मुस्लिम अपने भारतीय घर में अपनी संस्कृति और परंपरा की तर्ज पर पूर्ण और स्वतंत्र विकास का हकदार है, को स्थायी सांप्रदायिक समझौते के आधार के रूप में मान्यता दी जाती है, तो वह भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिए तैयार होगा। नेहरू रिपोर्ट में भी केखांकित किया गया है ‘So also without the fullest cultural autonomy – and communalism in its better aspect is culture – it will be difficult to create a harmonious nation’."
“भारत विभिन्न नस्लों से संबंधित, विभिन्न भाषाएँ बोलने वाले और विभिन्न धर्मों को मानने वाले मानव समूहों का एक महाद्वीप है। उनका व्यवहार सामान्य नस्ल-चेतना से बिल्कुल भी निर्धारित नहीं होता है। यहां तक कि हिंदू भी एक सजातीय समूह नहीं हैं। सांप्रदायिक समूहों के तथ्य को पहचाने बिना यूरोपीय लोकतंत्र के सिद्धांत को भारत पर लागू नहीं किया जा सकता है। इसलिए, भारत के भीतर, मुस्लिम भारत के निर्माण की, मुस्लिम मांग पूरी तरह से उचित है।”
“मैं पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को एक राज्य में मिला हुआ देखना चाहूंगा। एक समेकित उत्तर-पश्चिम भारतीय मुस्लिम राज्य का गठन मुझे कम से कम उत्तर-पश्चिम भारत के मुसलमानों की अंतिम नियति प्रतीत होता है। यह प्रस्ताव नेहरू समिति के समक्ष रखा गया। उन्होंने इसे इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि, यदि इसे लागू किया गया, तो यह बहुत ही बोझिल स्थिति पैदा कर देगा।”
“मैं उन्हें स्पष्ट रूप से बता सकता हूं कि मुस्लिम मांग मुक्त विकास की वास्तविक इच्छा से प्रेरित है जो पूरे भारत में स्थायी सांप्रदायिक प्रभुत्व को सुरक्षित करने की दृष्टि से, राष्ट्रवादी हिंदू राजनेताओं द्वारा विचार की गई, एकात्मक सरकार के तहत व्यावहारिक रूप से असंभव है।
1932 में तृतीय गोलमेज सम्मेलन के प्रतिनिधियों को वितरित किया गया एक पैम्फलेट, "पाकिस्तान घोषणापत्र", चौधरी रहमत अली द्वारा लिखा गया था और 28 जनवरी 1933 को प्रकाशित हुआ था, जिसमें पहली बार पाकिस्तान शब्द ("इ" अक्षर के बिना) का प्रयोग किया गया था। इस पैम्फलेट की शुरुआत इस प्रसिद्ध वाक्य से हुई थी -
“भारत के इतिहास के इस पवित्र क्षण में, जब ब्रिटिश और भारतीय राजनेता उस भूमि के लिए एक संघीय संविधान की नींव रख रहे हैं, हम अपनी साझी विरासत के नाम पर, पाकस्तान,(PAKSTAN without I) जिनसे हमारा तात्पर्य भारत की पांच उत्तरी इकाइयों से है, अर्थात: पंजाब,(Punjab) उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (Afghan Province), कश्मीर (Kashmir) सिंध (Sindh) और बलूचिस्तान (Baluchistan), में रहने वाले अपने तीस मिलियन मुस्लिम भाइयों की ओर से आपसे यह अपील करते हैं।”
“हमारा धर्म और संस्कृति, हमारा इतिहास और परंपरा, हमारी सामाजिक संहिता और आर्थिक व्यवस्था, उत्तराधिकार, उत्तराधिकार और विवाह के हमारे नियम, शेष भारत में रहने वाले अधिकांश लोगों के नियमों से मौलिक रूप से भिन्न हैं। वे आदर्श जो हमारे लोगों को सर्वोच्च बलिदान करने के लिए प्रेरित करते हैं, मूलतः उन आदर्शों से भिन्न हैं जो हिंदुओं को ऐसा करने के लिए प्रेरित करते हैं। ये अंतर केवल व्यापक, बुनियादी सिद्धांतों तक सीमित नहीं हैं। इससे कहीं अधिक। ये हमारे जीवन के सूक्ष्मतम विवरणों तक फैले हुए हैं। हम आपस में भोजन नहीं करते; हम आपस में विवाह नहीं करते। हमारे राष्ट्रीय रीति-रिवाज और कैलेंडर, यहाँ तक कि हमारा खान-पान और पहनावा भी अलग है।”
नेहरू समिति के सम्मुख पेश किये गये “मुस्लिम प्रोपोज़ल’ में संयुक्त निर्वाचन मंडल पर सहमति, मुहम्मद इकबाल के अध्यक्षीय भाषण और रहमतअली की अपील से स्पष्ट है कि मुस्लिम लीग देश का बंटवारा नहीं चाहती थी, वह केवल यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि संघीय ढाँचे के अंदर मुस्लिम बहुल इलाक़ों को पूर्ण स्वायत्तता मिले ताकि मुसलमान भी अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रख कर राष्ट्र के चहुंमुखी विकास में अपना योगदान दे सकें।
गांधी पूना पैक्ट में जातीय आधार पर दलितों के लिए अलग निर्वाचन मंडल की मांग को सैद्धांतिक रूप से खारिज कर चुके थे पर मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन मंडल पर उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं था, परंतु कांग्रेस के अंदर मौजूद हिंदुवादी, मुसलमानों की किसी भी मांग पर सहमति को मुसलमानों के तुष्टीकरण के रूप में ही देखते थे और विरोध करते थे। नेहरू धर्मनिरपेक्ष संघीय ढांचे के अंदर ही मुसलमानों को विशेषाधिकार दिये जाने के पक्षधर थे। जिन्ना को आशंका थी कि एकात्मक शासन प्रणाली केअंतर्गत मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए अलग प्रांत न होने की स्थिति में, अल्पसंख्यक मुसलमानों की स्थिति बहुसंख्यक हिंदुओं के मुकाबले दोयम दर्जे की हो जायेगी। जैसे जैसे भारत की आजादी का संघर्ष अपनी तार्किक परिणति की ओर बढ़ रहा था वैसे वैसे ब्रिटिश बुर्जुआजी तथा भारतीय सामंतशाही गठजोड़ और, स्वदेशी छोटी बड़ी बुर्जुआजी के गठजोड़ के बीच का अंतर्विरोध तीव्र होता जा रहा था। और इसके साथ ही, स्वतंत्र राष्ट्र के गठन की अनिश्चित रूपरेखा के अंदर अपने भविष्य की सुरक्षा के प्रति आशंकित, हिंदुओं तथा मुसलमानों के बीच भरोसा ख़त्म होता जा रहा था तथा वैमनस्य बढ़ता जा रहा था जो जगह जगह होनेवाले सांप्रदायिक दंगों के रूप में अभिव्यक्त हो रहा था।
ऐसी स्थिति में, सभी वर्गों को कुछ न कुछ राहत देकर संतुष्ट करने की बाजीगरी के साथ, केंद्रीय नियंत्रण अपने पास रखते हुए, अंग्रेज़ी राज ने अगस्त 1935 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के द्वारा भारत को डोमिनियन घोषित कर दिया। कहने को तो डोमिनियन का स्वरूप संघीय था और कानून बनाने की शक्तियां प्रांतीय विधान सभाओं को दी गई थीं और विषय समवर्ती नहीं थे। पर कौन सा विषय प्रांतीय सभा के दायरे में होगा और कौन सा संघीय सभा के दायरे में होगा यह तय करने का अधिकार गवर्नर जनरल के पास रखा गया था। इसी एक्ट के अनुरूप फरवरी 1937 में 11 प्रांतों में हुए चुनावों में कांग्रेस ने 8 में जीत हासिल की। पर कांग्रेस पूरी स्वायत्तता के बिना सरकार बनाने के लिए तैयार नहीं।
कांग्रेस ने लगभग चार महीने तक मंत्रिमंडलों का गठन नहीं किया और ब्रिटिश सरकार से अपने विधायी मामलों में हस्तक्षेप न करने की मांग की। उनके बीच विचार-विमर्श हुआ और अंततः, ब्रिटिश सरकार भारत सरकार अधिनियम, 1935 (321 अनुच्छेद तथा 10 अनुसूची) में कोई औपचारिक संशोधन किए बिना ही सहमत हो गई। परिणामस्वरूप, जुलाई 1937 में कांग्रेस मंत्रिमंडलों का गठन तो हुआ, लेकिन मुसलमानों के प्रति कठोर नीति के साथ: हिंदी राष्ट्रभाषा बनी, कांग्रेस का झंडा राष्ट्रीय ध्वज बना और बंदे मातरम राष्ट्रगान बना। गोहत्या पर सख्त प्रतिबंध लगा दिया गया और स्कूलों में बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास से लिया गया बंदे मातरम गाना शुरू किया गया। नई मस्जिदों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया गया और नमाज़ अदा करते समय मुसलमानों को परेशान किया गया। ये सरकारें द्वितीय विश्वयुद्ध होने तक चलीं। वायसराय द्वारा, कांग्रेस से सलाह किये बिना, भारत के युद्ध में शामिल होने की घोषणा से नाराज़ होकर कांग्रेस सरकारों ने इस्तीफ़ा दे दिया।
जिन्ना ने लंदन के एक साप्ताहिक, “टाइम एंड टाइड” में 9 मार्च 1940 को छपे अपने लेख में जिन्ना ने लिखा -
“इंग्लैंड जैसे समरूप राष्ट्रों की अवधारणा पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ भारत जैसे विषम देशों पर निश्चित रूप से लागू नहीं होतीं, और यही साधारण तथ्य भारत की सभी संवैधानिक बुराइयों का मूल कारण है... इसलिए, यदि यह मान लिया जाए कि भारत में एक बड़ा और एक छोटा राष्ट्र है, तो इसका अर्थ यह है कि बहुमत के सिद्धांत पर आधारित संसदीय व्यवस्था का अर्थ अनिवार्य रूप से बड़े राष्ट्र का शासन होगा। अनुभव ने सिद्ध कर दिया है कि किसी भी राजनीतिक दल का आर्थिक और राजनीतिक कार्यक्रम चाहे जो भी हो, हिंदू, सामान्यतः, अपनी जाति के साथी को वोट देगा, और मुसलमान अपने सहधर्मी को।”
कांग्रेस शासित प्रदेशों के बारे में उन्होंने लिखा,
“भारत भर में मुसलमानों पर हमला शुरू कर दिया गया। पाँच मुस्लिम प्रांतों में मुस्लिम नेतृत्व वाले गठबंधन मंत्रिमंडलों को हराने की हर संभव कोशिश की गई...छह हिंदू प्रांतों में एक "कुल्तुरकम्फ" का उद्घाटन किया गया। कांग्रेस पार्टी के गीत बंदे मातरम को राष्ट्रगान, पार्टी ध्वज और वास्तविक राष्ट्रभाषा उर्दू को हिंदी से बदलने के प्रयास किए गए। हर जगह उत्पीड़न शुरू हो गया और शिकायतें इतनी ज़ोरदार तरीके से आने लगीं...कि वायसराय और गवर्नरों द्वारा उनकी रक्षा के लिए कभी कोई कदम उठाए जाने से निराश मुसलमान अपनी शिकायतों की जाँच के लिए एक शाही आयोग की माँग करने पर मजबूर हो गए।”
इसके अलावा, उन्होंने आगे कहा:
"क्या यह (ब्रिटिश लोगों की) इच्छा है कि भारत एक अधिनायकवादी हिंदू राज्य बन जाए...? ... और मुझे पूरा विश्वास है कि मुस्लिम भारत ऐसी स्थिति के आगे कभी नहीं झुकेगा और अपनी पूरी शक्ति से इसका विरोध करने के लिए मजबूर होगा।"
अपनी समापन टिप्पणी में उन्होंने लिखा:
"जबकि मुस्लिम लीग किसी भी ऐसे संघीय उद्देश्य का अटल विरोध करती है, जिसका परिणाम लोकतंत्र और संसदीय शासन प्रणाली की आड़ में बहुसंख्यक समुदाय के शासन में होना आवश्यक हो... निष्कर्ष के तौर पर, एक ऐसा संविधान विकसित किया जाना चाहिए जो यह स्वीकार करे कि भारत में दो राष्ट्र हैं और दोनों को अपनी साझी मातृभूमि के शासन में साझेदारी करनी चाहिए।”
मार्च 1940 को मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में मुहम्मद अली जिन्ना ने कहा था -
“देवियो और सज्जनो, हमने कभी नहीं सोचा था कि कांग्रेस हाईकमान ने कांग्रेस शासित प्रांतों में इस तरह से काम किया होगा। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वे कभी इतने नीचे गिर जाएँगे। कांग्रेस शासित प्रांतों में हमें मुसलमानों के साथ दुर्व्यवहार और अत्याचार का सामना करना पड़ा। जनवरी 1939 से लेकर युद्ध की घोषणा तक जब कांग्रेस ने सभी सरकारों से त्यागपत्र दे दिया, हमें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।”
“युद्ध की घोषणा से पहले, भारत के मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा केंद्र सरकार में संघीय योजना के संभावित उद्घाटन से था। हम जानते हैं कि क्या-क्या षड्यंत्र चल रहे थे। लेकिन मुस्लिम लीग हर दिशा में उनका डटकर विरोध कर रही थी। हमें लगा कि हम भारत सरकार अधिनियम, 1935 में निहित केंद्रीय संघीय सरकार की ख़तरनाक योजना को कभी स्वीकार नहीं कर सकते।”
“अब, भविष्य के संविधान के संबंध में हमारी क्या स्थिति है? यह है कि जैसे ही परिस्थितियाँ अनुकूल हों, या ज़्यादा से ज़्यादा युद्ध के तुरंत बाद, भारत के भावी संविधान की पूरी समस्या की नए सिरे से जाँच की जानी चाहिए और 1935 के अधिनियम को हमेशा के लिए रद्द कर दिया जाना चाहिए। श्री गांधी ने कुछ दिन पहले जो कहा था, उस पर चर्चा करने से पहले, मैं कुछ अन्य कांग्रेसी नेताओं की घोषणाओं पर चर्चा करूँगा - जिनमें से प्रत्येक ने अलग-अलग स्वर में बात की है। मद्रास के पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजगोपालाचार्य कहते हैं कि हिंदू-मुस्लिम एकता का एकमात्र उपाय संयुक्त निर्वाचन मंडल है।”
“दूसरी ओर, बाबू राजेंद्र प्रसाद ने कुछ दिन पहले ही कहा था, "अरे, मुसलमानों को और क्या चाहिए?" 20 मार्च, 1940 को श्री गांधी ने कहा था: "मेरे लिए हिंदू, मुसलमान, पारसी, हरिजन, सब एक जैसे हैं।" "ऐसी स्थिति में आप शायद पूछेंगे कि मैं लड़ाई की बात क्यों कर रहा हूँ? मैं ऐसा इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि यह संविधान सभा के लिए लड़ाई है।” ”
“वह अंग्रेजों से लड़ रहे हैं। लेकिन क्या मैं श्री गांधी और कांग्रेस को यह बताना चाहूँगा कि आप एक संविधान सभा के लिए लड़ रहे हैं, जिसके बारे में मुसलमान कहते हैं कि वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते; जिसका अर्थ, मुसलमान कहते हैं, तीन बरक्स एक है; जिसके बारे में मुसलमान कहते हैं कि इस तरह गिनती करके वे कभी भी किसी ऐसे समझौते पर नहीं पहुँच पाएँगे जो दिलों से सच्चा समझौता हो, जो हमें दोस्तों की तरह काम करने में सक्षम बनाए; और इसलिए संविधान सभा का यह विचार ही, अन्य आपत्तियों के अलावा, आपत्तिजनक है।”
“क्यों नहीं आप एक हिंदू नेता के रूप में गर्व से अपने लोगों का प्रतिनिधित्व करते हुए आएँ, और मुझे मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते हुए गर्व से आपसे मिलने दें? जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है, मुझे बस इतना ही कहना है। हम नहीं चाहते कि ब्रिटिश सरकार मुसलमानों पर ऐसा संविधान थोपे जिसे वे स्वीकार न करें और जिससे वे सहमत न हों।”
“यह वही है जो एक बहुत ही चतुर राजनीतिज्ञ और एक कट्टर हिंदू महासभाई लाला लाजपत राय ने कहा था। “……एक और मुद्दा है जो मुझे हाल ही में बहुत परेशान कर रहा है और एक ऐसा मुद्दा जिस पर मैं चाहता हूं कि आप ध्यान से सोचें और वह है हिंदुस्तान-मुस्लिम एकता का प्रश्न। मैंने पिछले छह महीनों के दौरान अपना अधिकांश समय मुस्लिम इतिहास और मुस्लिम कानून के अध्ययन के लिए समर्पित किया है और मुझे लगता है कि यह न तो संभव है और न ही व्यावहारिक है।" "………. यद्यपि हम अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट हो सकते हैं, हम हिंदुस्तान पर ब्रिटिश तर्ज पर शासन करने के लिए ऐसा नहीं कर सकते। हम हिंदुस्तान पर लोकतांत्रिक तर्ज पर शासन करने के लिए ऐसा नहीं कर सकते।” ”
“हज़ारों वर्षों के घनिष्ठ संपर्क के बावजूद, वे राष्ट्रीयताएँ जो आज भी उतनी ही भिन्न हैं जितनी पहले थीं, उनसे कभी भी, उन्हें केवल एक लोकतांत्रिक संविधान के अधीन करके और ब्रिटिश संसदीय क़ानूनों के अप्राकृतिक और कृत्रिम तरीकों से उन्हें बलपूर्वक एक साथ रखकर एक राष्ट्र में परिवर्तित होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। डेढ़ सौ वर्षों तक भारत की एकात्मक सरकार ने जो हासिल किया, वह एक केंद्रीय संघीय सरकार के लागू करने से हासिल नहीं हो सकता। यह अकल्पनीय है कि उसे, इस प्रकार गठित सरकार के सरकारी-आदेश या कानूनी-आदेश द्वारा, सशस्त्र बल के बिना, पूरे उपमहाद्वीप में विभिन्न राष्ट्रीयताओं द्वारा स्वेच्छा और निष्ठापूर्वक पालन करवाया सके।”
“यदि ब्रिटिश सरकार वास्तव में इस उपमहाद्वीप के लोगों की शांति और सुख सुनिश्चित करने के लिए गंभीर और निष्ठावान है, तो हम सभी के लिए एकमात्र रास्ता यही है कि भारत को "स्वायत्त राष्ट्रीय राज्यों" में विभाजित करके प्रमुख राष्ट्रों को अलग-अलग मातृभूमि प्रदान की जाए। इन राज्यों के एक-दूसरे के प्रति शत्रुतापूर्ण होने का कोई कारण नहीं है। दूसरी ओर, प्रतिद्वंद्विता, और सामाजिक व्यवस्था पर प्रभुत्व स्थापित करने तथा देश के शासन में दूसरे पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की एक राष्ट्र की स्वाभाविक इच्छा और प्रयास, समाप्त हो जाएँगे। इससे उनके बीच अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के माध्यम से स्वाभाविक सद्भावना बढ़ेगी और वे अपने पड़ोसियों के साथ पूर्ण सद्भाव से रह सकेंगे। इससे मुस्लिम भारत और हिंदू भारत के बीच पारस्परिक व्यवस्थाओं और समायोजनों द्वारा अल्पसंख्यकों के संबंध में मैत्रीपूर्ण समझौता और भी आसानी से हो सकेगा, जिससे मुस्लिम और विभिन्न अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों और हितों की कहीं अधिक पर्याप्त और प्रभावी ढंग से रक्षा होगी।”
“यह समझना बेहद मुश्किल है कि हमारे हिंदू मित्र,इस्लाम और हिंदू धर्म के वास्तविक स्वरूप को क्यों नहीं समझ पाते। ये शब्द के सख्त अर्थ में धर्म नहीं हैं, बल्कि वास्तव में, अलग-अलग और विशिष्ट सामाजिक व्यवस्थाएँ हैं; और यह एक स्वप्न है कि हिंदू और मुसलमान कभी एक साझा राष्ट्रीयता विकसित कर सकें; और एक भारतीय राष्ट्र की यह भ्रांति सीमाओं से बहुत आगे निकल गई है और हमारी और भी परेशानियों का कारण बन रही है और अगर हम समय रहते अपनी धारणाओं को संशोधित नहीं करते हैं तो यह भारत को विनाश की ओर ले जाएगी। हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग धार्मिक दर्शन, सामाजिक रीति-रिवाजों और साहित्य से जुड़े हैं। वे न तो आपस में विवाह करते हैं और न ही एक साथ भोजन करते हैं, और वास्तव में वे दो अलग-अलग सभ्यताओं से संबंधित हैं जो मुख्यतः परस्पर विरोधी विचारों और अवधारणाओं पर आधारित हैं। जीवन और जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण भिन्न हैं। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि हिंदू और मुसलमान इतिहास के विभिन्न स्रोतों से अपनी प्रेरणा प्राप्त करते हैं। उनके अलग-अलग महाकाव्य हैं, उनके नायक अलग-अलग हैं, और अलग-अलग प्रसंग हैं। अक्सर एक का नायक दूसरे का शत्रु होता है, और इसी तरह उनकी जीत और हार एक-दूसरे से मिलती-जुलती होती हैं। ऐसे दो राष्ट्रों, जिनमें से एक संख्या में अल्पसंख्यक हो और दूसरा बहुमत में हो, को एक ही राज्य के अंतर्गत जोड़ने से असंतोष बढ़ेगा और अंततः ऐसे राज्य की सरकार के लिए बनाई गई किसी भी संरचना का विनाश होगा।”
भारत की एकता और एक राष्ट्र, जिसका अस्तित्व नहीं है, की दलील के तहत यहां एक केंद्रीय सरकार की लाइन का पालन करने की कोशिश की जा रही है, जबकि हम जानते हैं कि पिछले बारह सौ वर्षों का इतिहास ऐसी एकता हासिल करने में विफल रहा है और इन युगों के दौरान, भारत हमेशा हिंदू भारत और मुस्लिम भारत में विभाजित रहा है। भारत की वर्तमान कृत्रिम एकता केवल ब्रिटिश विजय के समय की है, और इसे ब्रिटिश संगीन द्वारा बनाए रखा गया है, लेकिन ब्रिटिश शासन की समाप्ति, जो कि महामहिम सरकार की हालिया घोषणा में निहित है, ऐसे पूरे विघटन का अग्रदूत होगी, जो मुसलमानों के अधीन पिछले एक हजार वर्षों के दौरान हुई सबसे बुरी तबाही से भी बहुत अधिक बुरी होगी। निश्चित रूप से यह वह विरासत नहीं है जो ब्रिटेन अपने एक सौ पचास साल के शासन के बाद भारत को देगा, न ही हिंदू और मुस्लिम भारत ऐसी निश्चित तबाही का जोखिम उठाएगा।”
“मुस्लिम भारत ऐसे किसी भी संविधान को स्वीकार नहीं कर सकता जिसका परिणाम अनिवार्य रूप से हिंदू बहुमत वाली सरकार हो। अल्पसंख्यकों पर थोपी गई लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत हिंदुओं और मुसलमानों को एक साथ लाने का मतलब केवल हिंदू राज हो सकता है। जिस तरह के लोकतंत्र से कांग्रेस हाईकमान मोहित है, उसका मतलब इस्लाम में सबसे कीमती चीज का पूर्ण विनाश होगा। पिछले ढाई वर्षों के दौरान प्रांतीय संविधानों के कामकाज का हमें पर्याप्त अनुभव है, और ऐसी सरकार की किसी भी पुनरावृत्ति से गृहयुद्ध और निजी सेनाओं के गठन की ओर अग्रसर होना होगा, जैसा कि श्री गांधी ने सुक्कुर के हिंदुओं से सिफारिश की थी जब उन्होंने कहा था कि उन्हें हिंसक या अहिंसक रूप से, वार के बदले वार करके अपनी रक्षा करनी चाहिए, और यदि वे ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें पलायन करना होगा। हम स्पष्ट रूप से भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में हैं। लेकिन यह पूरे भारत की स्वतंत्रता होनी चाहिए, न कि किसी एक वर्ग की स्वतंत्रता या इससे भी बदतर, कांग्रेस कॉकस की - और न ही मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों की गुलामी।”
20 मार्च 1927 के ‘मुस्लिम प्रपोज़ल’ में मुस्लिम लीग अलग निर्वाचन मंडल की मांग को छोड़ने के लिए तैयार थी बशर्ते कि उनकी बाकी माँगें मान ली जातीं, ख़ासकर सिंध को बंबई से अलग प्रांत के रूप में स्वीकार कर लिया जाता, पर हिंदू महासभा ने 28 अप्रैल 1928 को जबलपुर अधिवेशन में ‘मुस्लिम प्रपोज़ल’ को अस्वीकार कर दिया। जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस की मौजूदगी के बावजूद, हिंदू महासभा के तथा कांग्रेस के अंदर ही सामंती अधिनायकवादियों के विरोध के कारण इन माँगों को मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट की सिफारिशों में शामिल नहीं किया गया था।
मुस्लिम प्रपोज़ल, मुहम्मद इकबाल के अध्यक्षीय भाषण तथा जिन्ना के अध्यक्षीय भाषण से स्पष्ट है कि मुस्लिम लीग भारत का विभाजन नहीं चाहती थी, वह भारतीय राष्ट्रराज्य के अंदर ही, मुस्लिम-राष्ट्रीयता के लिए, हिंदू-राष्ट्रीयता के अधिनायकत्व से स्वतंत्र, एक स्वायत्त क्षेत्र की मांग कर रही थी।
अंतर्राष्ट्रीय तथा भारत की परिस्थितियों को देखते हुए अंग्रेज़ी हुकूमत ने भारत को पूर्ण स्वराज्य देने का मन बना लिया था और 14 जून 1945 को इसकी घोषणा कर दी गई। वावेल के प्रस्ताव के अनुसार कार्यकारी परिषद में संतुलन रखने के लिए हिंदू, मुसलमान, दलित, सिख आदि के प्रतिनिधियों की संख्या तय की गई थी। कांग्रेस अपने पास हिंदू और मुसलमान दोनों प्रकार के प्रतिनिधियों को नामित करने का अधिकार रखना चाहती थी जबकि जिन्ना केवल मुस्लिम लीग के पास ही मुसलमान प्रतिनिधि नामित करने का अधिकार चाहते थे। वायसराय लॉर्ड वावेल ने 25 जून को शिमला में राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के साथ बैठक की जिसमें गांधी और जिन्ना दोनों शामिल हुए थे। मुसलमानों के प्रतिनिधि के रूप में मुस्लिम लीग के एकाधिकार के प्रश्न पर सहमति न बन पाने के कारण, वावेल की योजना को छोड़ दिया गया।
जुलाई 1945 में हुए चुनावों में भारी जीत के बाद प्रधानमंत्री लार्ड एटली ने 20 फरवरी 1946 को ब्रिटिश पार्लियामेंट में वक्तव्य दिया था कि 30 जून 1948 तक भारत को संप्रभु राष्ट्र घोषित कर दिया जायेगा। नये राष्ट्र के निर्माण के लिए संविधान सभा की रूप रेखा और गठन की प्रक्रिया तय करने के लिए कैबिनेट मिशन के सदस्य, तय कर दिये गये जो 23 मार्च को भारत पहुंच गये थे।
अगले डेड़ महीने में कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा रियासतों के प्रतिनिधियों और अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ विमर्श के बाद कैबिनेट मिशन ने अपना प्लान अंग्रेज़ी सरकार को सौंप दिया जिसकी घोषणा 16 मई 1946 को प्रधानमंत्री एटली ने ब्रिटिश संसद में कर दी।
प्लान के अनुसार कैबिनेट मिशन प्लान में, ब्रिटिश इंडिया के सभी प्रांतों तथा रियासतों को शामिल कर भारतीय संघ बनाने की संस्तुति की गई थी जिसमें विदेश, रक्षा तथा संचार व्यवस्थायें संघीय सरकार के अधिकार क्षेत्र में थीं। अन्य सभी मामलों में प्रांतों को स्वायत्तता प्रदान की जानी थी। प्रांतों को आपस में ग्रुप बनाने की आजादी भी दी जानी थी।
मिशन ने भारत के लिए तीन स्तरों वाली एक जटिल व्यवस्था प्रस्तावित की: प्रांत, प्रांतीय समूह और केंद्र। छह मुस्लिम प्रांतों (पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, बलूचिस्तान, सिंध, बंगाल और असम) को एक समूह के रूप में एक साथ रखा जाएगा और वे विदेश मामलों, रक्षा और रक्षा के लिए आवश्यक संचार को छोड़कर अन्य सभी विषयों और मामलों से निपटेंगे, जिन्हें प्रांतों के दो समूहों - मुस्लिम प्रांतों (जिसे आगे पाकिस्तान समूह कहा जाएगा) और हिंदू प्रांतों - के संविधान-निर्माण निकाय एक साथ बैठकर निपटाएँगे।
मुस्लिम लीग की कार्यकारिणी ने 6 जून 1946 को कैबिनेट मिशन प्लान को स्वीकृति प्रदान कर दी थी।
10 जुलाई 1946 को प्रेस कॉंफ़्रेंस में नेहरू ने स्पष्ट कर दिया कि प्रांतों को तीन ग्रुपों में रखने के केबिनेट मिशन का प्लान कांग्रेस को स्वीकार्य नहीं है और न ही प्रांतों की पूर्ण स्वायत्तता। उनके अनुसार केंद्र के पास आपत्कालीन शक्तियाँ होना अनिवार्य है। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी होगी। उनके अनुसार संविधान सभा पूरी तरह स्वायत्त होगी और कांग्रेस अंग्रेज़ी सरकार की किसी भी पूर्व शर्त को नहीं मानेगी।
29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग की कार्यकारिणी ने भी अपनी स्वीकृति वापस ले ली।
प्लान के अनुरूप जुलाई 1946 में संविधान सभा का गठन कर दिया गया और सितंबर में अंतरिम सरकार भी बना दी गई थी।
जिन्ना जानते थे कि कांग्रेस के अंदर कट्टर हिंदू सामंती अधिनायकवादियों का बर्चस्व है और पूरी ईमानदारी और सच्चाई के बावजूद धर्मनिरपेक्ष बुर्जुआ जनवादी नेहरू और उनके साथी, एकात्मक राष्ट्र राज्य में मुसलमानों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पायेंगे। वे ब्रिटिश सरकार से गारंटी चाहते थे।
संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को आहूत की गई थी जिसकी अध्यक्षता सच्चिदानंद सिन्हा ने की थी। संविधान सभा में बहुसंख्यक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सैद्धांतिक रूप से धर्म के आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन के खिलाफ थी, लेकिन बुर्जुआ जनवादी नेहरू संघीय ढांचे के अंतर्गत मुसलमानों की सुरक्षा की आशंका को लेकर मुस्लिम लीग की मांगों पर किसी हद तक समझौता करने के लिए तैयार थे, परंतु कांग्रेस के अंदर एक बड़ा हिस्सा कट्टर हिंदूवादियों का भी था जो अल्पसंख्यकों को दिये जानेवाली किसी भी रियायत को अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के रूप में देखता था। संविधान सभा में कट्टर हिंदूवादी तथा रजवाड़ों के नामित सदस्यों का बहुमत था जो पटेल को अपने प्रतिनिधि के रूप में देखते थे
संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को आहूत की गई थी जिसकी अध्यक्षता सच्चिदानंद सिन्हा ने की थी। संविधान सभा में बहुसंख्यक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सैद्धांतिक रूप से धर्म के आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन के खिलाफ थी, लेकिन बुर्जुआ जनवादी नेहरू संघीय ढांचे के अंतर्गत मुसलमानों की सुरक्षा की आशंका को लेकर मुस्लिम लीग की मांगों पर किसी हद तक समझौता करने के लिए तैयार थे और कैबिनेट मिशन की सिफारशों के अनुरूप प्रांतों के तीन ग्रुपों के फार्मूले पर सहमत थे, पर कांग्रेस के अंदर एक बड़ा हिस्सा कट्टर हिंदूवादियों का भी था जो अल्पसंख्यकों को दिये जानेवाली किसी भी रियायत को अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के रूप में देखता था। संविधान सभा में कट्टर हिंदूवादी तथा रजवाड़ों के नामित सदस्यों का बहुमत था जो पटेल को अपने प्रतिनिधि के रूप में देखते थे।
मुस्लिम लीग की मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के स्वायत्त प्रदेशों के रूप में पुनर्गठन की मांग को, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा सिरे से खारिज कर दिये जाने के कारण, मुस्लिम लीग ने संविधान सभा का बायकॉट कर दिया और संविधान सभा की बैठक अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी गई। ब्रिटिश हुक्मरानों के सामने मुस्लिम लीग ने मांग रखी कि अगर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की स्वायत्त प्रांतों की उनकी मांग नहीं मानी जाती है तो वे चाहेंगे कि भारत का विभाजन कर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी जाय। राष्ट्रीय बुर्जुआजी अपनी मानसिकता के अनुरूप अपने हितों को ध्यान में रखते हुए, पूरे ब्रिटिश इंडिया साम्राज्य की एक स्वतंत्र राष्ट्र राज्य के रूप में कल्पना संजोये हुए थी, जब कि ब्रिटिश बुर्जुआजी तथा भारतीय सामंतशाही अपनी मानसिकता के अनुरूप, भारतीय उपमहाद्वीप का धार्मिक आधार पर विभाजन अपने हितों की पूर्ति के लिए अधिक उपयोगी मानते थे।
कांग्रेस में बुर्जुआ जनवाद का प्रतिनिधित्व करने वाला धड़ा जिसका प्रतिनिधित्व नेहरू करते थे, मुस्लिम लीग की धार्मिक आधार पर स्वायत्त प्रदेशों की मांग को छोड़कर, अल्पसंख्यकों के लिए अन्य किसी भी प्रकार के आरक्षण की मांग पर खुले मन से बात करने के लिए तैयार था। यहाँ तक कि, उचित समझौते पर पहुँचने के लिए वे आजादी की घोषणा को भी फ़िलवक्त टालने के लिए तैयार थे। महात्मा गांधी एकला चलो रे की अपनी व्यक्तिवादी मानसिकता के कारण अपने आपको, सभी वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में, पूरे उपमहाद्वीप के एकमात्र नेता के रूप में देखते थे, और इसकी वजह से वे हर हाल में बंटवारे के खिलाफ थे। यहाँ तक कि वे कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के अन्य सभी दावों को नजरंदाज कर जिन्ना को अखंड भारत का प्रधानमंत्री बनाने के लिए भी तैयार थे क्योंकि वे समझते थे जिन्ना की महत्वाकांक्षा तुष्ट हो जायेगी तो हिंदू मुस्लिम वैमनस्य समय के साथ समाप्त हो जायेगा।
कांग्रेस के अंदर सामंतवाद का प्रतिनिधित्व करने वाला धड़ा जिसका प्रतिनिधित्व सरदार पटेल तथा राजेंद्र प्रसाद करते थे, स्वभाविक रूप से कट्टर हिंदूवादी था और वे अल्पसंख्यकों को दी जानेवाली किसी भी रियायत को तुष्टीकरण के रूप में ही देखते थे और किसी भी कीमत पर आजादी की घोषणा टालने के लिए तैयार नहीं थे। इसके लिए उन्हें हिंदुस्तान के धार्मिक आधार पर बंटवारे से भी परहेज़ नहीं था।
संविधान सभा का गतिरोध समाप्त होता नजर नहीं आ रहा था तथा हिंदू मुस्लिम दंगे और अधिक हिंसक होते जा रहे थे। लार्ड वावेल भारत के विभाजन के पक्षधर नहीं थे और आशान्वित थे कि समय के साथ दंगों पर क़ाबू पा लिया जायेगा। पर इंग्लैंड में बैठे हुक्मरानों को ग्रेट ब्रिटेन के आर्थिक दिवालियेपन का इल्म था। ब्रैटनवुड में, अंतर्राष्ट्रीय विनिमय की मुद्रा के निर्धारण की मीटिंग में पाउंड स्टर्लिंग, अमेरिकी डॉलर के साथ मुकाबले में हार चुका था। गृहयुद्ध के कगार पर पहुँच चुके उपमहाद्वीप में शांति बनाये रखना ग्रेट ब्रिटेन की सामर्थ्य के बाहर हो गया था। ब्रिटिश हुक्मरानों के लिए, उपमहाद्वीप को ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के अंतर्गत रखते हुए, अपने हितों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हो गया था कि भारत को जल्दी से जल्दी दो राष्ट्रों में बांट कर स्वतंत्र कर दिया जाय। दो राष्ट्रों की योजना को कार्यान्वित करने के लिए कांग्रेस की सहमति जरूरी थी और इसके लिए, बंटवारे के लिए नेहरू को मनाना जरूरी था, जिसके लिए लॉर्ड वावेल उपयुक्त गवर्नर जनरल नहीं थे।
ब्रिटिश साम्राज्य के द्वारा 21 फरवरी 1947 को गवर्नरल-जनरल/वायसराय लॉर्ड वावेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को गवर्नरल-जनरल/वायसराय नियुक्त किया गया। नये गवर्नर जनरल ने, प्रांतों के पुनर्गठन तथा संघीय ढाँचे के प्रारूप पर नेहरू तथा जिन्ना के बीच सहमति के लिए गंभीर प्रयास किये। पर मतभेद जिन्ना तथा नेहरू के बीच न होकर, मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस के बीच थे। गांधी तथा नेहरू आजादी को कुछ समय तक टाल कर धार्मिक सौहार्द स्थापित करने के पक्षधर थे पर सरदार पटेल का आंकलन था कि वैमनस्य इतना बढ़ चुका था कि समझौते की कोई उम्मीद बाकी नहीं रही थी इस कारण यही बेहतर था कि बंटवारे की शर्त के साथ आजादी स्वीकार कर ली जाय। धार्मिक कट्टरवादियों द्वारा भड़काये जा रहे उन्माद के बीच तर्कबुद्धि की बलि चढ़ गई थी। धार्मिक जुनून के चलते हिंदुस्तान के बंटवारे की मांग ही समय की मांग बन गई थी। बढ़ती हिंदू-मुस्लिम वैमनस्यता तथा हिंसा के हवाले से नये वायसराय ने नेहरू को बंटवारे के लिए तैयार कर लिया और गांधी जी की हैसियत मूक दर्शक की रह गई। जून 1946 को गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने ब्रिटिश सरकार से सिफ़ारिश की कि हालात को देखते हुए गृह युद्ध को रोक पाना अंग्रेज़ी सरकार के लिए असंभव होगा इसलिए हिंदुस्तान का बंटवारा कर दोनों राज्यों को जल्द से जल्द आजाद कर दिया जाय। लार्ड माउंटबेटन की सिफ़ारिश को मानते हुए अंग्रेज़ी सरकार ने, मई-जून 1948 की प्रस्तावित आजादी की तारीख़ को खिसका कर 15 अगस्त 1947 कर दिया और 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश पार्लियामेंट ने हिंदुस्तान पाकिस्तान का बंटवारा स्वीकार करते हुए इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 पारित कर दिया।
भारत तथा पाकिस्तान को, स्वतंत्र-उपनिवेश (Dominion) के रूप में आजादी, ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा पारित क़ानून इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के अंतर्गत प्रदान की गई थी। जिस भौगोलिक क्षेत्र पर यह क़ानून लागू होता था वह केवल ब्रिटिश इंडिया के अधीन गवर्नर जनरल के प्रदेशों तक सीमित था। शासकों के साथ की गई पुरानी संधियों का आदर करते हुए, इस क्षेत्र के बाहर 584 राज्यों को आत्म निर्णय के अधिकार के साथ आजाद घोषित कर दिया गया था। आत्मनिर्णय के अधिकार में, भारत में विलय, पाकिस्तान में विलय या स्वतंत्र रहना, तीनों शामिल थे। बर्तानिया की सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि 15 अगस्त 1947 के बाद ब्रिटिश फ़ौजें रियासतों को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करेंगी।
भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस द्वारा चलाया जा रहा आजादी का आंदोलन ब्रिटिश इंडिया की सीमाओं के अंदर ही चलाया जा रहा था।
राज्यों के शासकों की, विलय की शर्तों पर निर्णय के लिए समय की कमी की दलील को मानते हुए, ब्रिटिश-भारतीय शासन ने विलय पत्र के साथ 3 जून 1947 को यथास्थिति क़रार पत्र का प्रारूप भी तैयार कर लिया था जिसे शासकों के समूह को 25 जुलाई 1947 को दिया गया था तथा जिसे शासकों द्वारा 31 जुलाई 1947 को स्वीकार कर लिया गया था। पंडित नेहरू ने शर्त रखी थी कि यथास्थिति का क़रार उन्हीं राज्यों के साथ किया जायेगा जो विलय के लिए तैयार होंगे। दो सप्ताह के अंदर ही 15 अगस्त 1947 की समय सीमा के पहले ही, भारतीय भौगोलिक सीमा के अंदर आने वाले सभी राज्यों, जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ तथा हैदराबाद को छोड़कर, सभी ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये थे। केवल हैदराबाद को दो महीने का अतिरिक्त समय दिया गया था। जूनागढ़ तथा उसकी अधीनस्थ रियासतों ने पाकिस्तान के साथ यथास्थिति क़रार पत्र तथा विलय पत्र पर 15 अगस्त 1947 को हस्ताक्षर कर दिये थे। राजा हरीसिंह जम्मू-कश्मीर के स्वायत्त स्वतंत्र राज्य का शासक बनने का सपना संजोये हुए था और उसने ब्रिटिश फ़ौजों का संरक्षण जारी रखने के लिए 12 अगस्त 1947 को भारत तथा पाकिस्तान को स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट साइन कर के भेजा था जिसे पाकिस्तान ने 15 अगस्त 1947 को स्वीकार कर लिया था पर भारत ने इनकार कर दिया था।
15 अगस्त 1947 की आजादी की तारीख़ से, संविधान लागू होने की तारीख 26 जनवरी 1950 तक भारत का शासन गवर्नर-जनरल/वायसराय की कार्यकारिणी की समिति के अधीन ही रहा। 15 अगस्त 1947 से 21 जून 1948 तक गवर्नर-जनरल थे अंग्रेज़ लॉर्ड माउंटबेटन तथा 21 जून 1948 को ब्रिटेन के महाराजा ने भारतीय सी. राजगोपालाचारी को गवर्नर-जनरल नियुक्त कर दिया था जो 26 जनवरी 1950 तक अपने पद पर बने रहे। शासन व्यवस्था गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के अनुसार ही थी।
दोनों नये राष्ट्रों की अपनी अपनी सेनाओं के गठन होने तक, ब्रिटिश इंडियन आर्मी को ही दो हिस्सों में बांट कर भारत तथा पाकिस्तान को आवंटित कर दिया गया था। ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सुप्रीम कमांडर फ़ील्ड मार्शल क्लॉड ऑचिनलेक को हिंदुस्तानी फ़ौज के कमांडर इन चीफ़ का दर्जा प्रदान किया गया था तथा ब्रिटिश इंडियन आर्मी की उत्तरी कमान के कमांडर ले. जनरल फ़्रेंकलिन मेसरवी को पाकिस्तानी फ़ौज के कमांडर इन चीफ़ का दर्जा प्रदान किया गया था। 26 जनवरी 1950 के बाद शासन व्यवस्था भारतीय संविधान के अंतर्गत आने के बाद ही सही मायने में भारत ने उपनिवेश के स्थान पर संप्रभु राष्ट्र का दर्जा प्राप्त किया था तथा स्वतंत्रता हासिल की थी
इस प्रकार भारतीय उपनिवेश के स्वतंत्रता संग्राम की परिणति, बंटवारे की त्रासदी के साथ दो राष्ट्रराज्यों के जन्म के रूप में हुई जिसमें दोनों ओर के लोग बंटवारे का दंश आज भी झेल रहे हैं।
इस कालखंड का इतिहास क्या होता अगर 1925 में गठित की गई भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने नव-जनवाद की अवधारणा को समझा होता, इस प्रश्न पर विमर्श का क्या कोई औचित्य होगा?
सुरेश श्रीवास्तव
12 अगस्त, 2025
(अप्रकाशित ‘कश्मीर फाइल्स के नजरंदाज सफे’ के कुछ अंश)
Saturday, 6 January 2024
2024 के चुनाव में, नरेंद्र मोदी की गारंटी, राहुल गांधी का इंडिया गठबंधन, और मार्क्सवादियों के कार्यभार।
2024 के चुनाव में, नरेंद्र मोदी की गारंटी, राहुल गांधी का इंडिया गठबंधन, और मार्क्सवादियों के कार्यभार।
मार्क्सवादी कौन है, मार्क्सवादी वह नहीं है जो मार्क्स को उद्धृत कर सके, मार्क्सवादी वह है जो मार्क्स की तरह सोच सके। जो अपने आप को मार्क्सवादी कहलाना पसंद नहीं करते हैं पर अपने जीवन के हर आयाम की पड़ताल में वैज्ञानिक मानसिकता के साथ सोचते हैं तथा व्यवहार करते हैं, वे भी मार्क्सवादी ही हैं। अनेकों आत्मघोषित मार्क्सवादी, जिस हद तक वे मार्क्सवाद तथा समाजवाद को स्टालिन तथा माओ के संदर्भ - समर्थन अथवा विरोध - से परिभाषित करते हैं, उस हद तक इस लेखक की नजर में वे मार्क्सवादी नहीं हैं और यह लेख उनके मुख़ातिब नहीं है।
मार्क्स ने समझाया था, ‘समय के साथ प्रकृति विज्ञान अपने में मानव विज्ञान को समाविष्ट कर लेगा, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार मानव विज्ञान अपने में प्रकृति विज्ञान को समाविष्ट कर लेगा, और फिर तब एक ही विज्ञान होगा’, और वह विज्ञान ही मार्क्सवाद है।
मार्क्स का कहना था कि दार्शनिकों ने विश्व की केवल व्याख्या की है, अनेकों प्रकार से; सवाल है उसे बदलने का। यह कहने की जरूरत नहीं कि जनवादी गणतंत्र राज्य का सर्वोच्च रूप है जिसके अंतर्गत ही सर्वहारा वर्ग तथा बुर्जुआ वर्ग के बीच का अंतिम निर्णायक युद्ध लड़ा जा सकता है क्योंकि जनवादी गणतंत्र आधिकारिक रूप से संपत्ति की असमानताओं को स्वीकार नहीं करता है, और अंतत: संपन्न वर्ग सीधे सार्विक मताधिकार के आधार पर शासन करता है। सर्वहारा वर्ग, जब तक अपने आप को स्वतंत्र करने के लिए परिपक्व नहीं हो जाता है, तब तक उसका बहुमत मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को ही एकमात्र संभव विकल्प समझता रहेगा और पूँजीपतियों के प्रतिनिधियों को ही चुनता रहेगा। जनवादी गणतंत्र की संवैधानिक संस्थाओं द्वारा किसी भी भेदभाव के बिना कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना कामगारों की परिपक्वता का द्योतक है, और जनवाद को सुदृढ़ करना सर्वहारा नेतृत्व का दायित्व है। जाहिर है आज जब राजनीतिक संघर्ष अधिनायकवादी और जनवादी ताकतों के बीच है, तो जरूरत है जनवादी ताकतों के साथ खड़े होने की।
हर वह चीज जो लोगों को चलाती है, उनके मस्तिष्क से गुजरनी चाहिए, पर वह मस्तिष्क के अंदर क्या रूप लेगी ये बहुत हद तक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा, परिस्थितियाँ मस्तिष्क के अंदर और बाहर दोनों। यह बात जितना व्यक्तियों के ऊपर लागू होती है उतनी ही वह व्यक्तियों के समूहों पर भी लागू होती है। मौजूदा परिस्थिति में मार्क्सवादियों का दायित्व है कि वे राजनीतिक आर्थिक परिस्थितियों के ठीक-ठीक विश्लेषण के साथ कामगारों की मानसिकता की सही-सही समझ हासिल करें और अधिनायकवादी और जनवादी ताकतों के बीच चल रहे संघर्ष में, जनवादी ताकतों का प्रतिनिधित्व करने वालों के साथ एकजुट हों तथा कामगारों को, मतदाता के रूप में उनकी अपनी भूमिका से अवगत करायें।
महान मूल विचार, कि संसार को तैयार चीज़ों के समुच्चय के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि प्रक्रियाओं के समुच्चय के रूप में समझा जाना चाहिए, जिसमें प्रतीत होनेवाली अनिश्चितता तथा अस्थाई अवनति के बावजूद एक प्रगतिशील विकास ही अंतत: प्रभावी होता है, आमचेतना में इतनी अच्छी तरह घर कर चुका है कि सर्वव्यापी नियम के रूप में उसका विरोध यदा कदा ही होता हो। पर इस मूलभूत विचार की शब्दों में स्वीकृति एक बात है, और यथार्थ के धरातल पर, हर किसी आयाम की पड़ताल में उसको व्यापक रूप में लागू करना बिल्कुल ही अलग बात है।
विज्ञान और तकनीकी के द्वंद्वात्मक संबंध से अठारहवीं सदी में हुई औद्योगिक क्रांति के बाद अब हम उस बिंदु पर पहुंच गए हैं जहां हम न केवल प्रकृति के विशेष क्षेत्रों में प्रक्रियाओं के बीच अंतर्संबंध प्रदर्शित कर सकते हैं, बल्कि इन विशेष क्षेत्रों के बीच परस्पर संबंध को भी प्रदर्शित कर सकते हैं। पूर्व में इस व्यापक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करना तथाकथित प्राकृतिक दर्शन का कार्य था। आज जब इस अंतर्संबंध का द्वंद्वात्मक चरित्र प्रकृति वैज्ञानिकों के आध्यात्मिक रूप से प्रशिक्षित दिमागों में उनकी इच्छा के विरुद्ध भी, खुद को स्वीकार्य बना रहा है, तो पारंपरिक दर्शन का अंत हो गया है। इसे पुनर्जीवित करने का हर प्रयास न केवल अतिशयोक्तिपूर्ण होगा, बल्कि एक प्रतिगामी कदम भी होगा।
मानव समाज की संरचना अमूर्त और अत्याधिक क्लिष्ट है, जिसका मूल आधार मनुष्यों के राजनीतिक तथा आर्थिक कार्यकलाप और उनके अंतर्संबंध हैं। मानव समूहों की उत्पादन-उपभोग प्रक्रिया के दौरान विकसित होने वाली उत्पादक शक्तियों तथा उत्पादन संबंधों और उनके आधार पर विकसित होने वाले व्यक्तिगत तथा सामूहिक चेतना के अंतर्संबंधों की वस्तुपरक पड़ताल की वैज्ञानिक पद्धति ही राजनीतिक-अर्थशास्त्र है, और पृथ्वी के अलग अलग भागों में अलग अलग कालखंडों में विकसित होने वाली सभ्यताओं और राष्ट्रीयताओं की विकास प्रक्रिया की इसी पद्धति के आधार पर की जाने वाली व्यख्या ही ऐतिहासिक भौतिकवाद है। ऐतिहासिक भौतिकवाद की सही समझ के आधार पर उत्पादक शक्तियों के विकास तथा उत्पादन संबंधों में सजग हस्तक्षेप करना ही वैज्ञानिक समाजवाद है। इच्छानुसार तथ्यों और ऑंकड़ों को जुटा कर कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है पर अज्ञात वास्तविक अंतर्संबंधों की मार्क्सवादी व्याख्या के स्थान पर आदर्श काल्पनिक अंतर्संबंधों को रखकर, अप्रमाणित तथ्यों को मन की कल्पनाओं से जुटा कर और वास्तविक रिक्तियों को केवल कल्पना में पाट कर अंतर्संबंधों की व्याख्या करना न केवल अतिशयोक्तिपूर्ण होगा, बल्कि एक प्रतिगामी कदम भी होगा। बुर्जुआ जनवादियों द्वारा, उत्पादन संबंधों को बदले बिना, सकल उत्पाद में बढ़ोतरी के साथ, स्वत: ही कामगारों के जीवन स्तर में सुधार तथा सामाजिक संबंधों में बदलाव की आकांक्षा करना और आश्वासनों तथा वादों के द्वारा कामगारों की चेतना को प्रभावित करने के प्रयास करना ही शेखचिल्ली समाजवाद है। वैज्ञानिक समाजवाद और शेखचिल्ली समाजवाद में यही अंतर है।
उच्चतम अवस्था में पहुंच चुकी पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं और पारंपरिक सामंतवादी उत्पादन संबंधों के अंतर्विरोध की परिणति, प्रथम विश्वयुद्ध की उथल पुथल और उसके बाद हुई अधिनायकवादी राजनीतिक व्यवस्थाओं के बुर्जुआ जनवादी राजनीतिक व्यवस्थाओं द्वारा विस्थापन के रूप में हुई। पूंजीवादी विकास के साथ ही विकसित हुई सर्वहारा चेतना भी अब, सामन्तवाद और पूँजीवाद के साथ तीसरी शक्ति के रूप में वर्ग संघर्ष के मैदान में आ गई थी जिसकी परिणति द्वितीय विश्वयुद्ध और नव-जनवाद के उदय में हुई। अब वैश्विक चेतना सर्वव्यापी हो गई हैू और वर्ग संघर्ष भी विश्वव्यापी हो गया है। वर्ग संघर्ष के आर्थिक दायरे में तीनों उत्पादक शक्तियाँ, सामंतवादी, पूँजीवादी और सर्वहारा संघर्षरत हो गई हैं और राजनीतिक दायरे में अधिनायकवादी, जनवादी और समाजवादी शक्तियाँ। चेतना के वैश्विक चरित्र तथा भारतीय उपमहाद्वीप के अंतर्गत आर्थिक तथा सामाजिक विविधताओं के कारण न तो उत्पादक शक्तियों तथा उत्पादन संबंधों का द्वंद्वात्मक संबंध उतना सीधा सपाट रह गया है और न ही उनके आधार पर विकसित होने वाली राजनीतिक चेतना। मार्क्स ने समझाया था कि हर वर्ग अपने जीवन के भौतिक आधार पर विचारों का तिलस्म खड़ा कर लेता है जो उसके भौतिक आधार से पूरी तरह असंबद्ध नजर आता है।
‘राजनीति में लोग हमेशा ही छलावे तथा ग़लतफ़हमी के शिकार रहे हैं, अज्ञानी होने के कारण, और होते रहेंगे, जब तक कि वे सभी नैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक वक्तव्यों, घोषणाओं तथा वायदों के पीछे एक या दूसरे वर्ग के हितों की पड़ताल करना नहीं सीख लेते हैं।’ और केवल मार्क्सवाद ही सही पड़ताल करने की क्षमता प्रदान करता है क्योंकि वह पूर्वाग्रहों को बेनकाब करने के लिए चीजों को मूल से पकड़ना सिखाता है। द्वंद्वात्मक- भौतिकवाद प्रकृति का मूलभूत शाश्वत सर्वशक्तिमान नियम है जो प्रकृति में होनेवाली सभी प्रक्रियाओं को परिभाषित और नियंत्रित करता है। मार्क्सवाद का मूल या अंतर्वस्तु, प्रकृति का मूलभूत नियम द्वंद्वात्मक- भौतिकवाद ही है और इसीलिए मार्क्सवाद सर्वशक्तिमान, शाश्वत है।
ऐतिहासिक-भौतिकवाद के नियमों के अनुरूप इंग्लैंड में पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था के विकास के साथ ही बुर्जुआ जनवादी राजनीतिक अवधारणा का विकास होता रहा था, पर संपत्ति के निजी स्वामित्व की अवधारणा, बदलते स्वरूप के साथ मूल रूप से अपरिवर्तनीय ही रही। पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था द्वारा सामंतवादी उत्पादन व्यवस्था के प्रतिस्थापन के साथ ही समाजवाद की अवधारणा भी अस्तित्व में आ गई थी। पर वह शेखचिल्ली समाजवाद था क्योंकि उसके पास यह समझ नहीं थी कि संपत्ति के निजी स्वामित्व की अवधारणा में बदलाव के बिना सामंतवादी अथवा पूँजीवादी उत्पादन उत्पादन संबंधों तथा उनसे उपजने वाली चेतना में बदलाव की उम्मीद करना ही शेखचिल्ली सपना है। अस्तित्व तथा चेतना के द्वंद्वात्मक संबंध की सही समझ से लैस, वैज्ञानिक समाजवाद ही सामंतवादी और पूँजीवादी उत्पादक शक्तियों के विकास को समजवाद की ओर मोड़ने में सक्षम है।
मार्क्सवाद के जन्म के शुरुआती दौर में, मार्क्सवाद पर हमला बाहर से था और अपनी मौजूदगी की पहली अर्ध सदी (1840 से लेकर) मार्क्सवाद ने, आधारभूत रूप से अपने विरोधी सिद्धांतों से लड़ने में गुज़ारी। नब्बे के दशक तक मोटे तौर पर जीत मुकम्मल हो चुकी थी। और मार्क्सवाद के अस्तित्व की दूसरी अर्धशताब्दी (नब्बे के दशक) की शुरुआत हुई, स्वयं मार्क्सवाद के अंदर मौजूद, मार्क्सवाद विरोधी रुझान के साथ संघर्ष से। इस रुझान का नामकरण किया गया एक समय के धुर मार्क्सवादी बर्नस्टाइन के नाम पर, जिसने मार्क्सवाद में बदलाव - मार्क्सवाद में संशोधन - के मकसद से सर्वाधिक कारगर धारणा, संशोधनवाद को आगे बढ़ाने तथा सबसे ज्यादा हाय-तौबा करने में पहल की।
1848 में भारतीय उपमहाद्वीप पर ईस्ट इंडिया कंपनी के एकछत्र शासन के बाद अगले पचास साल में उपमहाद्वीप में राजनीतिक और आर्थिक विकास अंग्रेजी साम्राज्य के व्यापारिक तथा क्षेत्रीय शासक वर्ग के सामंती हितों के अनुरूप हुआ। जो क्षेत्र कंपनी के आधीन था उसमें उत्पादक शक्तियों का विकास इंग्लैंड की पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था की अनुषंगी शक्तियों के अनुरूप हुआ। इसमें प्राकृतिक संसाधनों के दोहन तथा परिवहन संबधित उत्पादक शक्तियाँ ही विकसित हुईं। स्थानीय रियासतों के आधीन अंदरूनी क्षेत्र में उत्पादक शक्तियाँ पारंपरिक सामंतवादी ही रहीं और उनकी सामाजिक राजनीतिक चेतना में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
बीसवीं सदी के शुरू से ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ने अपनी गति पकड़ ली थी पर दिशा का निर्धारण दूसरे दशक की समाप्ति तक हो पाया। मध्यवर्ग की राजनीतिक चेतना, वैश्विक चेतना का हिस्सा बन गई थी। 1909 के इंडियन काउंसिल एक्ट जिसे मोर्ले-मिंटो रिफॉर्म के नाम से भी जाना जाता है, में चुने हुए प्रतिनिधियों को शामिल किया गया था जिसमें धार्मिक आधार पर मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र का प्रावधान किया गया था, पर प्रतिनिधियों को कानून बनाने का अधिकार नहीं था।
बीसवीं सदी के शुरू में ही, रूस के वामपंथी आंदोलन में व्याप्त संशोधनवाद से लड़ते हुए लेनिन ने समझाया था, ‘रूसी कम्युनिस्टों का मसला स्पष्ट रूप से यूरोपीय आलम दर्शाता है। ….. जो हमारे आंदोलन की वास्तविक परिस्थिति से थोड़े भी परिचित हैं, मार्क्सवाद के व्यापक विस्तार के साथ-साथ सैद्धांतिक स्तर में आई गिरावट उनकी नजरों में आये बिना नहीं रह सकती है। काफी तादाद में लोग, सतही या पूरी तरह नदारद सैद्धांतिक प्रशिक्षण के साथ, आंदोलन के व्यावहारिक महत्व तथा सफलता के कारण उसमें शामिल हो गये हैं।’ उन्होंने समझाया था कि कम्युनिस्ट आंदोलन अपने सार रूप में एक अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन है, और एंगेल्स की नसीहतों को दोहराते हुए उन्होंने कहा था कि इस आंदोलन के हित में नहीं है कि किसी एक देश के मजदूर अपने राष्ट्रीय आंदोलनों के आगे आगे चलें। उनका दायित्व है कि वे जनवादी गणतंत्र, जिसके अंतर्गत ही सर्वहारा वर्ग तथा बुर्जुआ वर्ग के बीच का अंतिम निर्णायक युद्ध लड़ा जा सकता है, को मज़बूत करने और लडाई के मैदान में सम्माननीय स्थिति हासिल करने की दिशा में काम करें।
प्रथम विश्वयुद्ध तथा सोवियत क्रांति की सफलता ने भारत में राजनीतिक आजादी की लड़ाई और वर्गीय संघर्ष दोनों को ही तीव्रता प्रदान की। अंग्रेज़ों ने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 जिसे मोंटेगू-चेम्सफोर्ड सुधारों के नाम से भी जाना जाता है, के जरिए जन आक्रोश को शांत करने का प्रयास किया। नये सुधारों में चुने हुए प्रतिनिधियों को कानून बनाने का अधिकार हासिल हो जाने के बाद वर्गीय महत्वाकांक्षाएँ भी तीव्र हो गईं।
सोवियत क्रांति की सफलता के साथ समाजवादी चेतना के विस्तार के लिए जरूरी उत्पादक शक्तियों को भौतिक आधार हासिल हो जाने के बाद, विभिन्न राष्ट्र राज्यों में सत्ता के लिए संघर्ष में सामंतवादी चेतना और पूँजीवादी चेतना के साथ सर्वहारा चेतना भी मैदान में थी। मार्क्स ने अन्नानिकोव को लिखे अपने पत्र में निम्न मध्य वर्गीय चरित्र के ढुलमुलपन को रेखांकित करते हुए दर्शाया था कि निम्नमध्यवर्गीय एक ओर तो विपन्नों की पैरोकारी करता है तो दूसरी ओर संपन्नों की ताबेदारी, पर अपनी सामाजिक परस्थिति के कारण सभी सामाजिक क्रांतियों का अभिन्न अंग भी होता है। और बुर्जुआवर्ग के चरित्र पर टिप्पणी करते हुए माओ ने ‘नये जनवाद’ में समझाया है कि जब दुर्जेय दुश्मन से मुक़ाबला होता है, वे उसके खिलाफ मजदूरों तथा किसानों के साथ एकजुट होते हैं, लेकिन जब मजदूर तथा किसान जागृत हो जाते हैं तो वे पाला बदल कर मजदूर तथा किसानों के खिलाफ दुश्मन से मिल जाते हैं। यह एक आम नियम है जो बुर्जुजी पर सारी दुनिया में लागू होता है।’ वे आगे समझाते हैं कि ‘चीन में जनवादी गणतंत्र जिसे हम स्थापित करना चाहते हैं, वह सर्वहारा के नेतृत्व में सभी साम्राज्यवाद विरोधी तथा सामंतवाद विरोधी लोगों का सामूहिक अधिनायकवाद होगा अर्थात ‘नया जनवाद’।
कामगारों की एकता को तोड़ने में धार्मिक और जातिवादी रूढ़ियॉं सबसे ज्यादा कारगर होती हैं इस कारण सामंतवादी और पूँजीवादी ताकतों ने हिंदू तथा मुस्लिम कट्टर धार्मिक संगठनों को खड़ा करने में सक्रिय भूमिका निभाई। दोनों वर्गों के धार्मिक उदारवादियों की मदद से कांग्रेस बुर्जुआ जनवाद के लिए आजादी की लड़ाई की बागडोर अपने हाथों में रखने में सफल रही। सोवियत क्रांति की सफलता से अभिभूत भारतीय निम्नमध्यवर्गीय युवा, अपनी संशोधनवादी समझ के कारण एंगेल्स तथा लेनिन की नसीहतों को नजरंदाज करते हुए और कामगारों को राजनीतिक रूप से वैज्ञानिक समाजवाद के बारे में शिक्षित किये बिना कम्युनिस्ट पार्टी का गठन कर बैठे और आजादी के आंदोलन में निर्णायक भूमिका गँवा बैठे। अपने जन्म से ही संशोधनवाद के दलदल में फँस गया भारतीय वामपंथी आंदोलन आज तक उस दलदल से नहीं निकल सका है।
कामगारों की चेतना में वैज्ञानिक समाजवाद, आर्थिक संघर्षों के दौरान स्वत: नहीं आता है। उसे मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों द्वारा संघर्ष के बाहर से लाया जाता है, जिस प्रकार शेखचिल्ली समाजवाद लाया गया था। भारतीय निम्नमध्यवर्गीय बुद्धिजीजीवियों की शिक्षा दीक्षा अंग्रेज़ी बुर्जुआ परंपरा पर आधारित थी इस कारण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में जिसे समाजवाद के नाम पर शामिल किया गया था वह वैज्ञानिक समाजवाद न हो कर शेखचिल्ली समाजवाद था और जिस सिद्धांत को मार्क्सवाद के नाम पर अपनाया गया था वह मार्क्सवाद न हो कर संशोधनवाद था। राजनीति के क्षेत्र में संशोधनवाद ने वास्तव में मार्क्सवाद के आधार को ही बदलने की कोशिश की है।
‘जो कोई भी संसदवाद तथा बुर्जुआ प्रजातंत्र के अनिवार्य आंतरिक अंतर्विरोधों, जिनके चलते मतभेदों के समाधान पहले के मुकाबले कहीं अधिक व्यापक हिंसा के कारण और अधिक उग्र होते हैं, को नहीं समझता है, वह व्यापक मजदूरवर्ग को ऐसे फ़ैसलों में विजयी अभियान के लिए तैयार करने के मकसद से संसदवाद के आधार पर कभी भी उसूल सम्मत प्रचार तथा आंदोलन नहीं चला सकता है। क्रांतिकारी सिद्धांत के बिना कोई क्रांतिकारी आंदोलन नहीं हो सकता है। इस समय तो हम केवल इतना कहना चाहते हैं कि हरावल लड़ाकू की भूमिका केवल ऐसा संगठन निभा सकता है जो अत्याधिक विकसित सिद्धांत से संचालित हो।’
कार्यभार का अर्थ है वांछित परिणाम हासिल करने के लिए पूर्वनियोजित सजग हस्तक्षेप, इस कारण कार्यभार निर्धारित करते समय उद्देश्य की स्पष्ट समझ और सामाजिक बदलाव की प्रक्रियाओं के नियमों, जो प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं, की पुख्ता समझ होना अनिवार्य पूर्व शर्त है। आगामी लोकसभा के चुनावों को तथा भारत की मौजूदा राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था को देखते हुए मार्क्सवादियों के कार्यभार दो भागों में बाँटे जा सकते हैं।
- फौरी कार्य भार है, भाजपा को सत्ता से बेदख़ल करने के लिए आगामी लोकसभा के चुनाव में इंडिया गठबंधन की ओर से सभी सीटों पर साझा उम्मीदवार सुनिश्चित करने के कांग्रेस के प्रयासों को, और सीटों के बंटवारे में राहुल गांधी को समर्थन दे कर कांग्रेस के आंतरिक अंतर्द्वंद्व में तथा भारतीय राजनीति के अंतर्द्वंद्व में बुर्जुआ जनवादी ताकतों को मज़बूती प्रदान करना।
- दीर्घकालीन कार्यभार है, वामपंथी आंदोलन में व्याप्त संशोधनवाद की मूल अवधारणाओं को बेनकाब कर नई पीढ़ी को मार्क्सवाद की मूल अवधारणाओं, द्वंद्वात्मक-भौतिकवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद से परिचित कराना ताकि संशोधनवाद के दलदल में फंसे मजदूर संगठनों को उससे बाहर निकाला जा सके।
फौरी कार्यभार -
अत्याधिक पिछड़ी सामंतवादी से ले कर अत्याधुनिक पूंजीवादी, विविध चेतना बहुल भारत में, आजादी के तथा पुनर्गठन के बाद, मुख्य अंतर्विरोध यथास्थितिवादी पारंपरिक सामंतवादी व्यवस्था तथा प्रगतिशील आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था के बीच था पर देश के अनेकों भागों में किसानों और मजदूरों के बीच वामपंथी आंदोलनों की मौजूदगी के कारण शक्ति संतुलन औद्योगिक पूँजी तथा बुर्जुआ जनवाद के हक़ में था। इसीलिए कांग्रेस के अंदर तथा संविधान सभा के अंदर सामंतवादी सोच के बहुमत के बावजूद नेहरू संविधान को संघीय स्वरूप देने में और स्थानीय औद्योगिक पूँजी के विकास के लिए ज़मींदारी उन्मूलन करने तथा नियोजित औद्योगिक नीति लागू करने में कामयाब रहे। अगले पचास साल में कांग्रेस ने मध्यमार्गीय नीति अपनाते हुए देश के आर्थिक विकास और जनवाद को उस स्तर पर पहुँचा दिया जहाँ अंतर्राष्ट्रीय परिवेश के अनुरूप उदारीकरण की नीतियाँ लागू कर विदेशी पूँजी के लिए रास्ता खोला जा सकता था। पर संशोधनवादी समझ के कारण वामपंथी संगठन यह समझने में नाकाम थे कि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य अंतर्विरोध सामन्तवाद और पूँजीवाद के बीच है, न कि पूँजीवाद और समाजवाद के बीच। अपनी संशोधनवादी समझ के कारण वे उद्योगों में विदेशी निवेश का विरोध करते रहे और अप्रत्यक्ष रूप से वाणिज्यिक पूँजी निवेश और सामन्तवाद की मदद करते रहे। सामन्तवाद में विनिमय का आधार वाणिज्यिक पूँजी ही होती है और क्रोनी कैपिटल वाणिज्यिक पूँजी का ही विकसित रूप है।
यूपीए-1 के दौर में वामपंथी संगठनों के समर्थन के कारण सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पूँजीवादी उत्पादक शक्तियों को तथा बुर्जुआ जनवाद को मज़बूत करने वाली नीतियाँ बनाने में सक्षम थी। पर यूपीए-2 में वामपंथियों का समर्थन न होने के कारण कांग्रेस को सामंती अधिनायकवादी क्षेत्रीय दलों पर पूरी तरह निर्भर रहना पड़ा और कांग्रेस के अंदर और बाहर सामंती अधिनायकवादी शक्तियों का पलड़ा भारी हो गया। फलस्वरूप 2014 के चुनाव में, सामंतवादी अधिनायकवादी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाली भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन केंद्र में सत्तानशीन हो गया और भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के विकास की दिशा भी उलटी हो गई।
भारतीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था को पुन: प्रगति की दिशा में मोड़ने के लिए आवश्यक है कि राजसत्ता को फिर से बुर्जुआ जनवादी ताकतों के नियंत्रण में लाया जाय। औद्योगीकरण के द्वारा उत्पादक शक्तियों के विकास के, तथा कमजोर और वंचित लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक कर जनवाद का आधार मज़बूत करने के बारे में राहुल गांधी की सोच स्पष्ट है। कांग्रेस के अंदर तथा बाहर बुर्जुआ जनवादी ताकतों की एकजुटता के लिए जरूरी है कि वामपंथी दल अपने को अग्रणी भूमिका में न रख कर पूरी मुस्तैदी के साथ राहुल गांधी के पीछे खड़े हों। इसके लिए सही वातावरण तैयार करने में मदद करना ही मार्क्सवादियों का फौरी कार्यभार है।
दीर्घकालीन कार्यभार -
उत्पादक शक्तियों के निरंतर विकास के समानांतर, उत्पादन संबंधों में राज्य के सजग हस्तक्षेप के जरिए निरंतर बदलाव करते जाना ही लोगों की सुरक्षा और ख़ुशहाली की गारंटी है और यही समाजवाद है। राजनीतिक अर्थव्यवस्था को समाजवाद की राह पर स्थापित करने और निरंतर समाजवाद की राह पर बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि राजसत्ता पर नियंत्रण ऐसी पार्टी का हो जिसका गठन जनवादी केंद्रीयता के नियम पर आधारित हो और जो वैज्ञानिक समाजवाद के लिए प्रतिबद्ध हो। ऐसी पार्टी के गठन के लिए जरूरी है कि उसके सदस्यों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधारित सिद्धांत मार्क्सवाद की पुख्ता समझ हो। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मार्क्सवादियों के दीर्घकालिक कार्यभार को दो भागों में बाँटा जा सकता है।
एक आयाम तो है सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग ऐसे बुद्धिजीवियों, जो किसी भी क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए क्रांतिकारी आंदोलन और क्रांतिकारी सिद्धांत के महत्व को समझते हों, को खोज निकालना और उन्हें एकजुट करना, और उनके साथ मार्क्सवाद और संशोधनवाद के मूलभूत अंतर को समझना और समझाना। पुरानी पीढ़ी के जिन मार्क्सवादियों के कंधों पर नई पीढ़ी को मार्क्सवाद की सही समझ से लैस करने का दायित्व है, पहले उन्हें स्वयं को शिक्षित करना होगा ताकि वे पारंपरिक संशोधनवाद के दलदल से बाहर निकल सकें। ‘स्वयं शिक्षा देनेवाले को शिक्षित किया जाना अनिवार्य है।’ इसके लिए जरूरी है कि मार्क्सवाद के विभिन्न आयामों के ऊपर ऐसे मंचों पर विषय केंद्रित विचार विमर्श किया जाय जो किसी राजनीतिक आर्थिक आंदोलन की अग्रणी भूमिका में नहीं हैं। विचार विमर्श के कार्यक्रमों को एक सतत क्रांतिकारी आंदोलन की तरह चलाना जरूरी है।
‘इसलिए जब सवाल इतिहास की उन चालक शक्तियों की पड़ताल का है जो, सजग तौर पर या अनजाने - और वास्तव में अक्सर अनजाने ही - इतिहास में काम करने वाले लोगों के मंसूबों के पीछे निहित होती हैं और जो इतिहास के वास्तविक अंतिम चालक बलों का गठन करती हैं, तब फिर सवाल किसी एक व्यक्ति, कितना भी प्रख्यात क्यों न हो, के मनसूबों का इतना अधिक नहीं है जितना कि उन मनसूबों का है जो आमजन को, व्यापक जनसमुदाय के सभी वर्गों को, हर जनसमुदाय को कर्म के लिए प्रेरित करते हैं, वह भी, केवल क्षणभर के लिए नहीं, भूसे के ढेर में लगी आग की तरह जो जल्दी ही ठंडी पड़ जाती है, बल्कि एक दीर्घकालीन सतत कर्म के लिए जिसकी परिणति ऐतिहासिक परिवर्तन में होती है। उन चालक कारणों, जो कार्यरत जनता तथा उसके नेताओं - तथाकथित महान पुरुषों- के सजग मनसूबों के रूप में स्पष्ट या अस्पष्ट तौर पर, सीधे-सीधे या आदर्श, महिमामंडित रूप में नजर आते हैं, को सुनिश्चित करना ही एकमात्र रास्ता है जिसके जरिए हम उन नियमों की पहचान कर सकते हैं जो संपूर्ण इतिहास में भी और किसी विशिष्ट कालखंड में तथा किसी विशिष्ट दिककाल में भी चीज़ों को निर्धारित करते हैं। हर वह चीज जो लोगों को चलाती है, उनके मस्तिष्क से गुजरनी चाहिए, पर वह मस्तिष्क के अंदर क्या रूप लेगी ये बहुत हद तक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।’
दीर्घकालीन कार्यभार का अगर एक आयाम उन लोगों को एकजुट करना है जो सर्वहारा के हरावल दस्ते का काम करेंगे तो दूसरा आयाम है सर्वहारा की चेतना में वैज्ञानिक समाजवाद की समझ का विस्तार करना। संशोधनवादी, पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली की सामूहिक श्रमशक्ति को व्यक्तिगत श्रमशक्ति से गुणात्मक रूप से भिन्न नहीं मानता है और मानता है कि पूंजी और श्रम के औजारों पर नियंत्रण तथा बुर्जुआ सरकार के समर्थन से पूंजीपति मजदूर को उसके द्वारा व्यक्तिगत रूप से पैदा किये गये मूल्य से कम मजदूरी चुका कर अतिरिक्त मूल्य हड़प कर उसका शोषण करता है। वह मानता है कि राजसत्ता के हस्तक्षेप के द्वारा पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य का मजदूरों के बीच बंटवारा ही शोषण से मुक्ति दिलाने का रास्ता है और मजदूरों की आर्थिक लड़ाई में मजदूरों के साथ खड़े होकर वह मजदूरों का विश्वास हासिल कर लेगा और सत्ता पर क़ाबिज़ हो जायेगा। इसे ही वह समाजवाद मानता है। पर यह सोच कामगारों की चेतना में निजी स्वामित्व की अवधारणा को ही बल प्रदान करती है जो समाजवाद की मूल अवधारणा के बिल्कुल विपरीत है। यही कारण है कि संशोधनवादी कामगारों को अपने पीछे लामबंद कर पाने में असफल रहते हैं।
‘यह सिद्ध हो गया था कि संशोधनवादी आधुनिक लघु-उत्पादन के बारे में सुचारू रूप से सुनहरी तस्वीर दर्शाने में लगे हुए थे। छोटे स्तर के उत्पादन के मुकाबले बड़े स्तर के उत्पादन में तकनीकी तथा वाणिज्यिक उत्कृष्टता न केवल उद्योग में बल्कि कृषि में भी निर्विवाद तथ्यों के आधार पर सिद्ध हो चुकी है।’ ‘लघु उत्पादन अपने आप को, निरंतर गिरते पोषण स्तर के द्वारा, दीर्घ कालिक भुखमरी के द्वारा, लंबे होते कार्य दिवस के द्वारा तथा पशुधन की गुणवत्ता तथा देखभाल में ह्रास के द्वारा, बरक़रार रख पाता है’। असंगठित क्षेत्र के कामगार की तुलना में अपनी बेहतर मजदूरी तथा बेहतर जीवन स्तर को देखते हुए, संगठित क्षेत्र के कामगार संशोधनवादियों की इस दलील को स्वीकार नहीं कर पाते हैं कि उन्हें कम मजदूरी देकर पूँजीपति उनका शोषण कर रहे हैं। संशोधनवादियों के, शेखचिल्ली समाजवाद के बारे में घोषणाओं तथा आश्वासनों पर विश्वास कर, मजदूरवर्ग संपन्न वर्ग के प्रतिनिधियों को ही अपने प्रतिनिधि मान कर उन्हें चुनता रहता है।
मजदूरवर्ग के बीच काल्पनिक समाजवाद तथा वैज्ञानिक समाजवाद के अंतर को स्पष्ट करना तथा समझाना कि उत्पादक शक्तियों को विकसित किये बिना न तो जनवाद को सुदृढ़ किया जा सकता है और न समाजवाद लाया जा सकता है, मार्क्सवादियों के दीर्घकालीन कार्यभार का दूसरा आयाम है।
सुरेश श्रीवास्तव
6 जनवरी, 2024
Monday, 25 April 2022
मार्क्सवादियों के नाम अपील
मार्क्सवाद का सिद्धांत सर्वशक्तिमान है क्योंकि वह सत्य है। वह सर्वव्यापी तथा समदर्शी है। कम्युनिस्ट पार्टियों तथा अन्य वामपंथी संगठनों के साथ संबद्ध और, इन सबसे असंबद्ध, मार्क्सवादियों के नाम अपील !
प्रिय प्रबुद्ध साथियो,
आप सब ने मार्क्सवाद को आत्मसात किया है और, आप मार्क्सवाद के महान शिक्षकों की नसीहतों से अपने अपने हिसाब से मार्गदर्शन लेकर अपने अपने कार्यभारों को तय करते रहे हैं। आज भारतीय राजनीति तथा अर्थव्यवस्था, आजादी के बाद के सबसे कठिन दौर से गुज़र रहीं हैं। इस बात की भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि अगर समय रहते सार्थक हस्तक्षेप नहीं किया गया तो प्रतिगामी शक्तियां समाज को अतीत के अंधेरे गर्त में गर्क कर छोड़ेंगीं जहाँ से बाहर निकलने में आनेवाली पीढ़ियों को दशकों तक संघर्ष करना होगा।
मार्क्सवाद के महान शिक्षकों के कुछ सबक हैं जिनकी रोशनी में आप सबसे मैं कुछ कहना चाहता हूँ।
सबक नं 1. क्रांतिकारी सिद्धांत के बिना कोई क्रांतिकारी आंदोलन नहीं हो सकता है।
सबक नं 2. सिद्धांत जनता के मन में घर कर लेने पर भौतिक शक्ति में परिवर्तित हो जाता है।
सबक नं 3. मार्क्सवाद का सिद्धांत सर्वशक्तिमान है क्योंकि वह सत्य है। वह सर्वव्यापी तथा समदर्शी है और मानव को एक सर्वांगीण वैश्विक दृष्टिकोण प्रदान करता है। मार्क्सवाद का दार्शनिक आयाम भौतिकवाद है और विकास का सिद्धांत द्वंद्ववाद है। जिस प्रकार मानव का ज्ञान प्रकृति (यानि विकासरत पदार्थ), जिसका अस्तित्व उससे निरपेक्ष है, का प्रतिबिंब है, उसी प्रकार मानव का सामाजिक ज्ञान (यानि उसके अनेकों विचार तथा सिद्धांत - दार्शनिक, धार्मिक, राजनैतिक इत्यादि) समाज की आर्थिक प्रणाली को प्रतिबिंबित करता है।
सबक नं 4. जिस प्रकार और सभी वैचारिक आयामों में, परंपराएँ यथास्थितिवादी शक्तियाँ मुहैय्या कराती हैं, उसी प्रकार धर्म के एक बार अस्तित्व में आने के बाद उसके अंदर भी परंपरा का तत्त्व उसी तरह मौजूद रहता है। लेकिन इस तत्त्व का रूपांतरण वर्ग संबंधों के कारण होता है - अर्थात उन लोगों के बीच के आर्थिक संबंध जो इन रूपांतरणों का कारण बनते हैं।
सबक नं 5. हर वर्ग अपने आर्थिक संबंधों के आधार पर सामाजिक और राजनैतिक विचारों का एक ऐसा तिलस्म खड़ा कर लेता है जो उसके आर्थिक आधार से पूरी तरह असंबद्ध नजर आता है।
सबक नं 6. किसी ज्ञान या सिद्धांत की सच्चाई व्यक्तिपरक भावनाओं से तय नहीं होती है, बल्कि सामाजिक व्यवहार में वस्तुपरक परिणामों से तय होती है।
सबक नं 7. अगर मनुष्य सफल होना चाहता है, अर्थात, अपेक्षित परिणाम हासिल करना चाहता है, तो उसे अपने विचारों को बाहरी वास्तविक जगत के साथ समन्वित करना होगा; अगर उनका समन्वय नहीं होगा तो वह अपने प्रयास में नाकाम होगा।
सबक नं 8. राजनीति में लोग हमेशा ही छलावे तथा ग़लतफ़हमी के शिकार रहे हैं, अज्ञानी होने के कारण, और होते रहेंगे जब तक कि वे सभी नैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक वक्तव्यों, घोषणाओं तथा वायदों के पीछे एक या दूसरे वर्ग के हितों की पड़ताल करना नहीं सीख लेते हैं। विशेष तौर पर नेतृत्त्व की यह ज़िम्मेदारी है कि वह सभी वैचारिक मसलों की गहन समझ हासिल करे।
सबक नं 9. काफी तादाद में लोग सतही या पूरी तरह नदारद सैद्धांतिक प्रशिक्षण के साथ, आंदोलन के व्यावहारिक महत्व तथा सफलता के कारण उसमें शामिल हो गये हैं।
सबक नं 10 इस समय तो हम केवल इतना कहना चाहते हैं कि हरावल लड़ाकू की भूमिका केवल ऐसा संगठन ही निभा सकता है जो अत्याधिक विकसित सिद्धांत से संचालित हो।
सबक नं 11 राज्य का सर्वोच्च रूप, जनवादी गणतंत्र, जो हमारी आज की सामाजिक परिस्थितियों में अधिक से अधिक अटलनीय आवश्यकता बन गया है, और जो राज्य का वह स्वरूप है केवल जिसके अंतर्गत ही सर्वहारा वर्ग तथा बुर्जुआ वर्ग के बीच का अंतिम निर्णायक युद्ध लड़ा जा सकता है - जनवादी गणतंत्र आधिकारिक रूप से संपत्ति की असमानताओं को स्वीकार नहीं करता है।
सबक नं 12 उत्पीड़ित वर्ग, हमारे मामले में सर्वहारा वर्ग, जब तक अपने आप को स्वतंत्र करने के लिए परिपक्व नहीं हो जाता है, तब तक उसका बहुमत मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को ही एकमात्र संभव विकल्प समझता रहेगा, तथा राजनीतिक रूप से पूँजीवादी वर्ग का ही दुमछल्ला बना रहेगा।
सबक नं 13 सार्विक मताधिकार कामगारों की परिपक्वता का मापदंड है। वह आधुनिक राज्य के अंतर्गत इससे अधिक न कभी हो सकता है और न कभी होगा, पर यही काफी है। जिस दिन सार्विक मताधिकार का थर्मामीटर कामगारों के बीच खलबली का चरम बिंदु दर्शाने लगेगा, वे, और पूँजीपति भी समझ जायेंगे कि वे कहाँ पहुंच गये हैं।
सबक नं 14 आंदोलन के हित में भी नहीं है कि किसी एक देश के मजदूर उसके आगे आगे चलें - बल्कि वे लड़ाई के मैदान में एक सम्माननीय स्थान हासिल करेंगे, और जब या तो औचक गंभीर परीक्षा की घड़ी या फैसलाकुन वाक़या उनसे अत्याधिक साहस, अत्याधिक दृढ़ता तथा ऊर्जा की मांग करेगा तब वे लड़ाई के लिए मुस्तैद तैयार खड़े होंगे।
सबक नं 15 एक ही रास्ता है, और वह है, हमारे चारों ओर के इसी समाज में उन शक्तियों, जो उस क्षमता का गठन कर सकती हैं जो पुरातन को बुहार कर नये का निर्माण करने में सक्षम है तथा जिन्हें अपनी सामाजिक परिस्थिति के कारण करना चाहिए, को ढूँढ निकालना और संघर्ष के लिए उन्हें जागरूक तथा संगठित करना।
सबक नं 16 ऐतिहासिक घटनाएँ समग्र रूप से संयोग के नियम के अनुरूप प्रतीत होती हैं। लेकिन जहां सतह पर आकस्मिकता का बोलबाला है, वहां वास्तव में यह हमेशा आंतरिक, छिपे हुए कानूनों द्वारा नियमित होता है, और बात केवल इन नियमों की खोज की है।
सबक नं 17 महान मूल विचार, कि संसार को तैयार चीज़ों के समुच्चय के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि प्रक्रियाओं के समुच्चय के रूप में समझा जाना चाहिए, जिसमें, जितनी देर तक स्थिर हमारे मस्तिष्क में उनके प्रतिबिंब अर्थात अवधारणाएं रहती हैं, केवल उतनी देर तक स्थिर प्रतीत होनेवाली चीज़ें, अस्तित्व में आने और नष्ट होने वाले अनवरत परिवर्तन से गुज़र रही हैं, जिसमें प्रतीत होनेवाली अनिश्चितता तथा अस्थाई अवनति के बावजूद एक प्रगतिशील विकास ही अंतत: प्रभावी होता है। यह आधारभूत विचार, विशेषकर हेगेल के समय के बाद से, आमचेतना में इतनी अच्छी तरह घर कर चुका है कि सर्वव्यापी नियम के रूप में उसका विरोध यदा कदा ही होता हो। पर इस मूलभूत विचार की शब्दों में स्वीकृति एक बात है, और यथार्थ के धरातल पर, हर किसी आयाम की पड़ताल में उसको व्यापक रूप में लागू करना बिल्कुल ही अलग बात है।
सबक नं 18 मेरा दृष्टिकोण, जिस में समाज के आर्थिक निर्माण के विकास को इतिहास की सहज प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, व्यक्ति को उन संबंधों के लिए उत्तरदायी कैसे ठहरा सकता है जो उसके स्वयं के सामाजिक स्वरूप के निर्माता हैं, मनोगत रूप से वह कितना भी अपने आप को उन से ऊपर मानता रहे।
साथियो अंग्रेज़ों से आजादी मिलने के बाद, संविधान सभा द्वारा पारित संविधान के अनुसार, विविधताओं वाले अनेकों प्रदेशों तथा रियासतों का, सार्विक मताधिकार आधारित बुर्जुआ जनवादी गणराज्य के रूप में गठन किया गया था जिसमें गुप्त मतदान के आधार पर चुनी गई जन प्रतिनिधि सभाओं में राष्ट्रराज्य की सभी शक्तियां निहित हैं। प्रतिनिधि सभाओं द्वारा पारित कानून आम लोगों के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन और व्यवहार का नियमन करते हैं। अपने जन प्रतिनिधि को चुनने का, बिना किसी भेद-भाव के समान अधिकार सभी को है, यह विचार पिछले 75 साल में आम जनचेतना में अच्छी तरह घर कर चुका है। इसीलिए प्रतिनिधि सभाओं द्वारा पारित कानून, छुटपुट औपचारिक अहिंसक विरोधों के बावजूद आमतौर पर स्वीकार्य होते हैं। आम जनता को हिंसक विरोध स्वीकार्य नहीं है। वोट न देने के बावजूद मेहनतकश वर्ग, बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधियों को ही अपना प्रतिनिधि मानता है।
मार्क्सवादी होने के नाते आप जानते हैं कि मौजूदा व्यवस्था में सभी सामाजिक समस्याओं का कारण, सामूहिक रूप से पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य का व्यक्तिगत हस्तांतरण ही है। पर श्रम आधारित मूल्य और अतिरिक्त-मूल्य के सिद्धांत ने जनचेतना में घर नहीं किया है क्योंकि श्रम आधारित मूल्य के सिद्धांत की समझ, अत्याधिक विकसित मजूरी आधारित पूँजीवादी व्यवस्था को प्रतिबिंबित करती है, जब कि देश में 95% श्रमिक आबादी, सामंतवादी तथा असंगठित बुर्जुआ उत्पादन व्यवस्था का हिस्सा है, केवल 5% मजदूरी आधारित श्रमिक आबादी है और इसी कारण आम जनचेतना सामंती परंपरावादी, बुर्जुआ आत्मवादी और धार्मिक रूढ़िवादी है।
व्यक्तिगत-श्रम तथा सामूहिक-श्रम द्वारा भौतिक जीवन का उत्पादन, मानव जीवन का तथा मानव समाज का आधार है और, उत्पादन के साधनों का तथा उत्पादक शक्तियों का विकास मानव समाज की स्वभाविक प्रक्रिया है। सकल घरेलू उत्पाद का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक कृषि और असंगठित तथा लघु उत्पादन क्षेत्र से आता है जिसमें अतिरिक्त मूल्य का हस्तांतरण वाणिज्यिक पूँजी के जरिए होता है। इस कारण भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य अंतर्विरोध वाणिज्यिक पूँजी और औद्योगिक पूँजी के बीच है और राजनीतिक अंतर्विरोध सामंती-अधिनायकवाद और बुर्जुआ-जनवाद के बीच है। अर्थव्यवस्था में संख्याबल के रूप में मजूरी आधारित सर्वहारा की भागीदारी 5% है इस कारण राजनीतिक रूप से सर्वहारा-जनवाद या समाजवाद का समय अभी बहुत दूर है।
भारत की राजनीतिक-आर्थिक प्रतिगामी दिशा को रोकने और उसे अग्रगामी दिशा प्रदान करने के लिए जरूरी है कि 2024 के चुनाव के लिए अग्रगामी शक्तियों को एकजुट किया जाय। वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधारित सिद्धांत की समझ से लैस होने के कारण यह आपका दायित्व है कि आप उन शक्तियों को एकजुट करें और यह आपको करना चाहिए। एकजुटता के इस प्रयास के लिए सीटों की अपनी दावेदारी आगे न रखें बल्कि न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर एकजुटता हासिल करें और एकजुटता के प्रयास में सम्माननीय स्थान हासिल करें तथा औचक गंभीर परीक्षा की घड़ी में मुस्तैद तैयार खड़े हों।
2024 के चुनाव में दो मुख्य राष्ट्रीय पार्टियाँ आमने सामने होंगीं। वाणिज्यिक-पूँजी तथा सामंती-अधिनायकवाद के प्रतिनिधि के रूप में भाजपा और औद्योगिक-पूँजी तथा बुर्जुआ-जनवाद के प्रतिनिधि के रूप में कांग्रेस। बाकी प्रादेशिक राजनीतिक दल महागठबंधन बनाने का प्रयास करेंगे पर वह केवल लोगों को भ्रमित ही करेगा। जाहिर है मार्क्सवादी होने के नाते आपका प्रयास होना चाहिए कि 2024 के चुनाव के लिए सभी प्रगतिशील ताकतें कांग्रेस के नेतृत्व में एकजुट हों। इसकी मांग और प्रयास अभी से शुरू कर दिये जाने चाहिए ताकि कांग्रेस के आंतरिक अंतर्द्वंद्व में संतुलन, प्रतिगामी ताकतों की तुलना में प्रगतिशील ताकतों के हक़ में हो।
देश की राजनीतिक प्रक्रिया में तीन कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा अनेकों अन्य संगठन हैं जो मार्क्सवादी होने का दम भरते हैं। अनेकों संगठनों तथा गुटों की मौजूदगी सर्वहारा चेतना के विस्तार और कामगारों की एकजुटता में एक बड़ा रोड़ा है। प्रत्यक्ष में वे एकजुट नहीं हो पाते हैं क्योंकि उनके बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के विश्लेषण के बारे में मतभेद हैं और फलस्वरूप क्रांतिकारी आंदोलनों की रणनीति के बारे में भी मतभेद हैं। पर मूल कारण है कि आजादी की लड़ाई में वामपंथी आंदोलन की नींव ही मार्क्सवाद की संशोधनवादी समझ के साथ रखी गई थी और हमेशा से लोग सतही या पूरी तरह नदारद सैद्धांतिक प्रशिक्षण के साथ, आंदोलन के व्यावहारिक महत्व तथा सफलता के कारण उसमें शामिल होते रहे हैं। यही कारण है कि औचक गंभीर परीक्षा की घड़ी या फैसलाकुन समय पर वे हमेशा ही गलत निर्णय लेते रहे हैं। कौन सही था और कौन गलत था, यह तर्क से तय नहीं हो सकता है। सौ साल बाद भी वामपंथी आंदोलन अपने आपको विकल्प के रूप में पेश करने की स्थिति में नहीं है, इस बात की तसदीक़ करता है कि वामपंथी यथार्थ के बारे में अपनी समझ को यथार्थ के साथ समन्वित करने में नाकाम रहे हैं। सभी वामपंथी गुटों के नेतृत्त्व की यह ज़िम्मेदारी है कि वह सभी वैचारिक मसलों की गहन समझ हासिल करे और कामगारों को सर्वहारा चेतना से लैस करे।
उम्मीद है आप सभी SFS (सोसायटी फॉर सांइंस) की बार बार दी जा रही चेतावनी पर ग़ौर करेंगे और नई पीढ़ी के सामाजिक सरोकारों के प्रति जागरूक युवाओं को, किसी के साथ प्रतिबद्ध होने से पहले, विमर्श के जरिए मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम की समझ हासिल करने में मदद करेंगे।
व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में सफलता के लिए
शुभकामनाओं के साथ
सुरेश श्रीवास्तव
22 अप्रैल, 2022
Wednesday, 12 January 2022
Boycott of Ferozepur meeting and PM’s security in Punjab : A Marxist View
Boycott of Ferozepur meeting and PM’s security in Punjab : A Marxist View
On 5th January, 2022, Sri Narendra Modi, who is also the Prime Minister of India, had to address a public meeting organised by BJP in Ferozepur, Punjab. In this meeting, he was going to lay foundation stones for development works for Punjab, worth 42,750 crore rupees. In view of the forthcoming assembly elections in Punjab, this programme was of great importance for BJP. According to scheduled programme, Sri Narendra Modi was to fly from Delhi to Bhatinda base airport by aircraft and from there he was to take a helicopter ride. The programme included Prime Minister’s visit to National Martyrs Memorial at Hussainiwala to pay tributes to martyrs, before Ferozepur public meeting.
Prime Minister’s aircraft landed at Bhisiyana airport at 11:05, but because of rain and bad weather it was not possible to continue onward journey by helicopter. Travel by road from Bhisiyana to Hussainiwala was very long, 120 km, about 2 hours. The farmers in Punjab were protesting and were staging dharnas at every Tehseel, Block, and District headquarter, and they had declared to show black flags to the Prime Minister and to burn his effigies. Prime Minister’s programme to pay homage to martyrs at Hussainiwala was also not so very important that, in spite of bad weather and the farmers’ protest, he should have been taken to Hussainiwala by road. But for BJP, Sri Narendra Modi’s reaching in BJP’s public meeting was of utmost priority. After due deliberations, out of the two options - return to Delhi or to take up the road journey to Hussainiwala and then to the public meeting in Ferozepur - it was decided to take the Prime Minister’s convoy by road to the Martyrs Memorial and then to the public meeting. After informing Punjab government and the administration, within half an hour Prime Minister’s convoy started for the Martyrs Memorial at Hussainiwala by road. At 12:15 chief minister Sri Channi informed that two employees in his office have been found Corona positive and he will not be accompanying the Prime Minister in person and he would be joining through video conferencing.
At 01:30 Prime Minister Sri Narendra Modi posted on Twitter, “I look forward to being among my sisters and brothers of Punjab today. At a programme in Ferozepur, the foundation stone of development works worth Rs. 42,750 crore would be laid, which will improve the quality of life for the people.”
(https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1787138).
For the past several days, farmers' organizations have been making announcements through Gurdwaras and by meeting people personally urging to boycott the meeting. They were stopping the buses being brought by BJP by staging dharnas and pradarshans from place to place. Due to all this, the lack of enthusiasm for the rally on Wednesday morning was clearly visible. A leader of the BJP's Kisan Morcha himself said, “The party leaders [to mobilize the crowd] could not get much help even from the “Labor Chowks”. Meanwhile, the rain had also increased the trouble at the meeting place. From 12:15 onwards, news started doing the rounds in the media with pictures that the crowd could not gather at the meeting place and the chairs were empty. It was informed at 2.15 pm that PM Narendra Modi's rally in Ferozepur has been canceled due to rain and he will return to Delhi from Bhisiana airbase in Bathinda.
After this, a round of allegations and counter-allegations started doing round between the Congress and the BJP regarding Shri Narendra Modi having been stranded on the flyover and demonstrators having reached close to his vehicle. While BJP has been claiming it a security lapse and holding Congress government of Punjab responsible for it, Congress is alleging it to be a BJP drama to garner public sympathy in the face of falling popularity of the Prime Minister. As usual, the lower middle class intellectuals are divided and supporting or opposing this or that depending upon their prejudices.
It is the responsibility of socially conscious intellectuals to analyze the situation objectively and accurately and guide the new generation so that the new generation can play a meaningful role in social change.
The great philosopher Hegel said that a king is a king because people think so and the king knows it. And Marx had explained, "Society is not made up of individuals but represents itself as the sum of inter-relationships, the relations between which the individual stands". For those who have seen the Guide picture of Devananda and understood his mental discourse while fasting for the rain, it should not be difficult to understand the statement of Hegel and Marx.
Shri Narendra Modi is one person but the roles he plays are two, one as the representative of the Bharatiya Janata Party and the other as the representative of the state. As the leader of the Bharatiya Janata Party, he has to behave according to the sum total of the aspirations of the RSS and its affiliated organizations and the followers of the BJP and, as a representative of the state, he has to behave in accordance with the aspirations of the nation and the general public. More or less the same is the situation of Shri Amit Shah also.
The political system that the country had chosen after independence under the leadership of the Congress was a step ahead of even the most developed bourgeois democracy in England and in line with the thinking of the Utopian Socialist lower middle class intellectual, the constitution was also framed on the lines of the Government of India Act of 1935. But the economy was mainly feudal backward, within which capitalism was making its debut, that is, the beginning of bourgeois production relations.
In the early stages the contradictions between feudalism and capitalism were not very sharp and it was not difficult for the Congress leadership to strike a balance between the elements representing both within the Congress and within the country.
But with the integration of global capital and the alliance of Indian capital with it, the contradictions between feudalism and capitalism in India have become very sharp. A detailed discussion of India's plural socio-economic structure is not possible here, but today the main contradictions are represented by the Congress and the BJP. It is becoming impossible for both the political parties to maintain an internal balance and the process of intense polarization is going on in both.
Just as an individual has a vision, every organization has its own ideology. Congress is a bourgeois democratic party with progressive thinking, believing in collective leadership and policy of economic development through industrial capitalism. BJP is a totalitarian party with a regressive mindset, a belief in individual dictatorial leadership, and a policy of economic development through a system-backed crony-capitalism
The kind of rapid polarization that is going on in the country with irreconcilable contradictions both in the political parties and in the country, it is bound to be finally resolved according to the natural laws with the negation of regressive forces. Despite the regressive thinking of all its subsidiaries, it is a practical compulsion for the BJP to feign support for progressive policies to gain majority support in the current democratic system.
And who could know it better than Shri Narendra Modi that the followers and supporters of the subsidiary organizations and BJP accept him as their leader because they think that Narendra Modi can fulfill their agenda by maintaining his honest image and garnering support from the government and crony capitalists. He also knows that to remain in the seat of Prime Minister, the support of the liberal lower middle class is more necessary than the support of allies and the followers of BJP. Shri Narendra Modi is well-versed in playing the dual role - when to play the role of a Hindutva religious leader and when to play the role of a secular leader with ‘Sarv dharm sam-bhaav’, committed to the Constitution.
As always, Modi wanted the UP elections to be fought in his name so that after the election his trusted chief minister could be installed, but he had to give up before Yogi's insistence and had to announce the name of Yogi as the future Chief Minister. In West Bengal, in spite of the campaign by the entire cabinet he had to face defeat. After accepting defeat in front of the solidarity of the farmers, a decision had to be taken to withdraw the three laws and apologize to the farmers. Modi was beginning to see his and the BJP's political ground slipping due to the falling economy, rising unemployment and a vocal opposition. In order to strengthen the position of BJP in the upcoming elections in five states, strategy was formulated to announce development plans worth thousands of crores. Announcements have already been made in UP as part of the strategy to announce the gift of schemes worth thousands of crores. The proposed public meeting of Ferozepur was also part of this strategy.
Had his program as Prime Minister been only to pay homage at the martyr's site, the Home Ministry would have brought him back to Delhi from Bathinda airport by not allowing the Prime Minister to go to Hussainiwala by road. But here, as Narendra Modi, he had to play his second role as the top leader of the BJP which was far more important to the party and to Narendra Modi himself. Therefore, it was decided to travel by road and the Prime Minister's convoy was dispatched immediately after giving proper information to the concerned offices and the local administration.
After traveling unhindered for 120 km, the convoy reached the martyr's memorial in about two hours. After paying tribute, the convoy entered the border of Ferozepur in no time. By this time the news had come that there were only a few hundred audience at the meeting place and thousands of chairs were lying vacant. It would have been embarrassing for Narendra Modi as the top BJP leader to address a crowd of a few hundred listeners. So the convoy was stopped on the flyover. Simply canceling the public meeting would have been seen as another victory for the farmers and another defeat for Narendra Modi. Therefore, after waiting for 20 minutes, BJP supporters and opponents were given a chance to raise slogans so that the retreat of Shri Narendra Modi could be given the color of threat to the security of the Prime Minister and the upcoming elections could be won by creating frenzy across the country.
Once earlier also the election was won by inciting frenzy in the name of Pulwama. BJP wants to win the election by repeating the history of 2019. But BJP forgets that history repeats itself, but first time it is tragedy, second time it is fraud. BJP will soon realise that the solidarity of the farmers' movement has decided that the workers and farmers will fight together and expose every fraud.
Suresh Srivastava
9 January, 2022
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FOOTNOTE
The Ministry of Home Affairs, in a statement, said the Prime Minister landed in the morning at Bathinda airport from where he was to go to the National Martyrs Memorial at Hussainiwala by helicopter.“Due to rain and poor visibility, the Prime Minister waited for about 20 minutes for the weather to clear out. When the weather did not improve, it was decided that he would visit the National Martyrs Memorial via road, which would take more than two hours,” it said.
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‘Large number of buses were stranded because of the high-handedness of the police & connivance with protestors’ .Jagat Prakash Nadda, President, BJP
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The state BJP unit had claimed that five lakh people would turn up for the Prime Minister Narendra Modi’s Ferozepur rally, but it could hardly gather 5,000 people, proving to be a big embarrassment for the saffron party.
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Tribune, 5, January 2022
The BJP had claimed to have arranged 3,200 buses to ferry people from across the state to the rally venue in Ferozepur. The state leadership had allocated buses to each office-bearer of the party. Some constituencies were allocated about 60 buses.
However, sensing lukewarm response ahead of the PM’s rally, the party started reducing the number of buses that were to be pressed into service — so much so that the parking arrangement at the rally venue was reduced to just 500 buses.
Farmers’ organisations had been preparing for a stiff opposition for several days.They made announcements from village gurdwaras, asking people not to attend the rally. The cold wave and showers added to the BJP’s woes.
As a result, the tepid response was all too visible on Wednesday morning. The party could not gather enough numbers to fill the buses to their optimum capacity. “Even party leaders could not get much help from labour chowks,” said a senior leader of the BJP’s kisan morcha. (Source : tribune.com)
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लाइव अपडेट (Source : amar ujala.com)
02:15 PM, 05-JAN-2022
पीएम नरेंद्र मोदी की फिरोजपुर में होने वाली रैली बरसात के कारण रद्द कर दी गई है। सूत्रों ने यह जानकारी दी। वे बठिंडा के भसियाना एयरबेस से दिल्ली लौटेंगे।
02:07 PM, 05-JAN-2022
फरीदकोट के कोटकपूरा में पीएम मोदी की फिरोजपुर की रैली में जा रहे भाजपा वर्करों की बसों को किसानों ने रोक लिया है। दोनों पक्षों के बीच तनातनी हो गई। इसके बाद पुलिस ने बसों को दूसरे रास्ते से भेजा।
01:42 PM, 05-JAN-2022
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हुसैनीवाला बॉर्डर पहुंचकर शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को श्रद्धासुमन अर्पित किए। कुछ ही देर में वह पंजाब के लिए 5 बड़े प्रोजेक्टों का उद्घाटन करेंगे।
01:33 PM, 05-JAN-2022
फिरोजपुर रैली से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया कि मैं आज पंजाब की अपनी बहनों और भाइयों के बीच रहने के लिए उत्सुक हूं। फिरोजपुर में एक कार्यक्रम में 42,750 करोड़ रुपये के विकास कार्यों के शिलान्यास रखे जाएंगे, जिससे लोगों के जीवन स्तर में सुधार होगा।
12:22 PM, 05-JAN-2022
फिरोजपुर में लगातार हो रही बरसात ने दिक्कत बढ़ा दी है। अभी तक रैली स्थल पर सभी कुर्सियां खाली पड़ी हैं।
12:17 PM, 05-JAN-2022
प्रधानमंत्री मोदी की रैली में सीएम चरणजीत चन्नी नहीं आएंगे। सीएम चन्नी ने कहा कि वह प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए जाना चाहते थे लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय में दो लोग कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद उन्होंने अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया है। चन्नी वर्चुअल तरीके से कार्यक्रम से जुड़ सकते हैं।
Tuesday, 4 June 2019
सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में, उन्मादकों, उन्माद तथा संशोधनवाद की भूमिका।
सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में, उन्मादकों, उन्माद तथा संशोधनवाद की भूमिका
( 2014 के चुनाव सोलहवीं लोकसभा के चुनाव नतीजों का मेरा पूर्वानुमान गलत साबित हुआ था और आत्मालोचना के रूप में मैंने मार्क्स दर्शन के ब्लॉग पर लेख लिखा था ‘सोलहवीं लोकसभा में प्रत्याशित जनादेश’ जिसमें मैंने रेखांकित किया था कि ‘इतिहास गवाह है कि हर पीढ़ी में जनता ने अपनी समस्यायों से निजात पाने के लिए इंदिरा गांधी, जयप्रकाश नारायन और वी.पी. सिंह जैसों को मसीहा बनाया, और फिर अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में उनको असफल पाकर उनको नकार कर इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया। मौजूदा दौर में भी जनता ने अन्ना हजारे, फिर अरविंद केजरीवाल और अंत में मोदी को अपना मसीहा बनाया है। जनता मसीहा ढूंढ रही थी, भाजपा अपनी आंतरिक कलह के बीच राजनीतिक स्वीकार्यता के लिए पार्टी के लिए नया चेहरा ढूंढ रही थी। नरेंद्र मोदी में भाजपा को अपना चेहरा मिल गया और जनता को अपना मसीहा। हाल फिलहाल जनता खुशफहमी में है कि नया मसीहा उसे निजात दिलायेगा। हमें वक्त का इंतजार करना होगा और नये मसीहा को समय देना होगा कि इतिहास उसका मूल्यांकन करे।’ http://marx-darshan.blogspot.com/2014/05/blog-post.html) सत्रहवीं लोकसभा के नतीजों से पहले भी मैं मानकर चल रहा था कि जिस परिपक्वता का परिचय राहुल गांधी दे रहे हैं तथा उनकी स्वीकार्यता बढ़ती जा रही, उससे लगता था कि कांग्रेस गठबंधन सरकार बनाने में सफल होगी, पर इस बार भी मेरा अनुमान गलत साबित हुआ। लेकिन इस बार ग़लती के कारण पिछली बार के मुकाबले में भिन्न हैं। महान दार्शनिक हेगेल का कहना था कि एक राजा, राजा इसलिए होता है क्योंकि प्रजा ऐसा सोचती है, और राजा यह जानता है। राजा की व्यक्तिगत चेतना तथा प्रजा की सामूहिक चेतना का यही द्वंद्वात्मक संबंध है। बुर्जुआ जनवाद में एक नेता, नेता इसलिए होता है क्योंकि जनता ऐसा सोचती है, और नेता यह जानता है। नेता के लिए यह जानना जरूरी है कि जनता किस तरह सोचती है तथा उसके लिए यह भी जरूरी है कि वह इस प्रकार आचरण करे कि जनता सोचने लगे कि एकमात्र वही नेता होने योग्य है। मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी को 2019 के चुनाव में भारी बहुमत से दोबारा सरकार की बागडोर सौंपी है क्योंकि इस समय भारतीय मतदाताओं की नजरों में वे सरकार को नेतृत्व प्रदान करने के लिए सबसे अधिक सक्षम तथा योग्य व्यक्ति हैं। दर्जनों राजनीतिक पार्टियों तथा अस्मिता की राजनीति के चलते छोटे छोटे समूहों में विभाजित मतदाताओं ने, किस मानसिकता के कारण एकमत से निर्णय लिया कि नरेंद्र मोदी ही सरकार की बागडोर संभालने के लिए सबसे योग्य व्यक्ति हैं, इसकी पड़ताल जरूरी है। भारतीय अर्थव्यवस्था सामंतवाद तथा पूँजीवाद के जिस संक्रमण काल में है तथा संशोधनवादियों ने राजनीतिक-अर्थशास्त्र के मूलभूत सिद्धांत (मार्क्सवाद) के बारे में जिस प्रकार का भ्रम फैला रखा है, उसमें समाजवाद की दुहाई देनेवाली अनेकों पार्टियों की मौजूदगी तथा उनका अस्मिता की राजनीति करना स्वभाविक है। स्वभाविक रूप से आम आदमी के लिए जीवनोपयोगी वस्तुओं की उपलब्धता सबसे अहम मसला होता है जिसके आधार पर व्यक्ति की अनभिज्ञ-चेतना तथा समूह की भौतिक-सामाजिक-चेतना का निर्माण होता है। तार्किक रूप से व्यक्ति का दीर्घकालिक आचरण मूल रूप से उसके जीवन से जुडी गतिविधियों अर्थात उसके आर्थिक हितों की पूर्ति से निर्धारित होता है। पर तीव्र उन्माद की स्थिति में व्यक्ति की तर्कबुद्धि जड़ हो जाती है और व्यक्ति का आचरण नियमित न होकर अनियमित हो जाता है। जो बात व्यक्ति पर लागू होती है वही समूह पर भी लागू होती है। घरेलू अर्थव्यवस्था के स्तर पर पिछले साढ़े चार साल में नरेंद्र मोदी की सरकार ऐसी कोई सफलता हासिल नहीं कर सकी जिसके आधार पर उन्हें 2019 के चुनाव में बहुमत हासिल हो पाता। बल्कि जनवरी आते आते सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा प्राप्त ख़बरों से भाजपा को समझ आ गया था कि अगर जल्दी ही जनता को उन्माद की हद तक उत्तेजित नहीं किया गया तथा शांत चित्त के साथ वोट देने दिया गया तो कॉंग्रेस के मुकाबले में भाजपा की हार निश्चित है। संघ परिवार हिंदु-मुसलमान वैमनस्य, लव जिहाद, गोहत्या, बाबरी मस्जिद, असम में नागरिक पंजीकरण आदि के नाम पर धार्मिक ध्रुवीकरण कराने तथा उत्तेजना को उन्माद के स्तर तक भड़काने में नाकाम हो रहा था। सर्वधर्म समभाव की मानसिकता वाले व्यापक हिंदु समाज को धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करके उन्माद की हद तक उत्तेजित कर पाना असंभव है। धार्मिक कट्टरपन के आधार पर मध्यवर्ग के एक हिस्से को दंगे करने की हद तक उत्तेजित कर पाना तो संभव है, पर व्यापक हिंदु समाज को लंबे समय तक उन्मादित रख पाना असंभव था। और अर्थव्यवस्था तथा सांप्रदायिक सौहार्द के मामले में विपक्ष काफी हद तक भाजपा सरकार को घेर पाने में कामयाब नजर आ रहा था। नरेंद्र मोदी के मुकाबले में राहुल गांधी की जनप्रियता भी बढ़ती जा रही थी। राहुल गांधी परिपक्वता दिखाते हुए क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ कर पाने में भी कामयाबी की तरफ बढ़ते नजर आ रहे थे। अस्मिता की राजनीति के चलते अनेकों समूहों में बंटा भारतीय मतदाता मानसिक संतुलन की स्थिति में, नोटबंदी के कारण जीडीपी में हुई गिरावट, जीएसटी की उँची दरों तथा काग़ज़ी कार्यवाही के झमेलों के कारण होनेवाली परेशानी तथा बेरोज़गारी जैसे अहम मसलों को नजरंदाज करते हुए, विवेकपूर्ण निर्णय के साथ भाजपा को वोट देगा ये कल्पनातीत था। खंडित जनादेश की दशा में भाजपा के लिए फिर से सरकार बना पाना असंभव होता। ऐसे में कट्टर राष्ट्रवाद ही एक ऐसा विचार हो सकता था जिसके आधार पर व्यापक मतदाता को कुछ समय तक तीव्र उन्माद की मनःस्थिति में रखा जा सकता था। और फरवरी से चुनाव होने तक इस उन्माद को हवा देने तथा बरक़रार रखने के लिए राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में सारे अवयव मौजूद थे। पिछले तीन साल से जेएनयू के कुछ छात्रों के खिलाफ टुकड़े टुकड़े गैंग के आरोप लग ही रहे थे, ऐसे में वामपंथ ने अपनी अवसरवादी नीति के चलते कन्हैया कुमार को केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। कश्मीर में आतंकवाद तथा धारा 370 से संबंधित उन्माद का उत्पादन करने वाले उत्पादक निरंतर उन्माद पैदा करने के लिए मीडिया में अंतहीन बहसें चला ही रहे थे। जितना ज्यादा कन्हैया कुमार के नारे ‘आजादी लेके रहेंगे’ को प्रचारित प्रसारित किया जा रहा था उतना ही संघ परिवार का राष्ट्रवाद के नाम पर खड़ा किया गया विभाजन तीव्र होता जा रहा था। इस माहौल में राहुल गांधी के रोजगार तथा आर्थिक उत्पादन के तर्कपूर्ण बयानों की प्रत्यक्षता आच्छादित होते जाना स्वाभिक था, जबकि कांग्रेस के अपने दिग्गज नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ने के अति उत्साह में, अपने रणक्षेत्र को छोड़ कर, भाजपा द्वारा रचे जा रहे चक्रव्यूह में जा कर लड़ने पर आमादा थे। आंतरिक अर्थव्यवस्था तथा मध्य एशिया तथा सुदूर पूर्व की राजनीतिक व्यवस्था के मोर्चे पर असफलता के कारण अमेरिकी प्रशासन कट्टर राष्ट्रवादी भावनाओं को उभारकर जनमत अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रहा था।अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन के द्वारा पेश चुनौतियों के कारण भारत तथा अमेरिका दोनों के हित में था कि अंधराष्ट्रवाद के उन्माद को ज्यादा से ज्यादा हवा दी जाये। मसूद अज़हर को प्रतिबंधित करने का मसला कई महीनों से सुलग रहा था। ऐसे में पुलवामा पर हमले ने उचित माहौल तैयार कर पर्याप्त विस्फोटक सामग्री भी मुहैया करा दी थी। बस जरूरत थी पलीत लगाने की जिसके लिए अमेरिकी सहयोग तथा सहमति पहली शर्त थी। पटकथा तैयार की गई कि घटनाक्रम को इस प्रकार अंजाम दिया जाय कि यह दर्शाया जा सके कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की नकेल कसने के लिए जिस दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है वह केवल नरेंद्र मोदी के पास ही है और चीन तथा पाकिस्तान के गठजोड़ के खिलाफ भारत की संप्रभुता तथा अखंडता को बचा कर रखने की क्षमता लौह पुरुष नरेंद्र मोदी के अलावा और किसी में नहीं है। इसके लिए पुलवामा पर हुए हमले के बदले पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी शिवर पर हमले के लिए अमेरिका की सहमति तथा मसूद अज़हर को प्रतिबंधित करने के लिए चीन की सहमति आवश्यक थी। पटकथा के सफल मंचन के लिए अमेरिका तथा चीन की सहमति तथा सहयोग आवश्यक था, पर सहयोग हासिल करने के लिए कुछ न कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती। मध्य एशिया में अमेरिका अपना रणनीतिक बर्चस्व बरक़रार रखना चाहता है और उसकी मांग थी कि ईरान के खिलाफ अमेरिका द्वारा लगाये गये प्रतिबंधों को प्रभावी बनाने के लिए भारत को ईरान से तेल लेना बंद कर अमेरिका से तेल लेना होगा। चीन मध्य एशिया से लेकर दक्षिणपूर्व एशिया तक शांति तथा सहयोग के लिए गंभीरता से प्रयास करता रहा है, क्योंकि यह उसकी महत्वाकांक्षी ओबीओआर सिल्क रूट योजना की सफलता के लिए बहुत जरूरी है। चीन की मांग थी कि दोनों ओर से कोई भी सामरिक कार्यवाही करते समय संयम बरता जाय तथा पुलवामा पर हुए हमले के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार न ठहराया जाय। अपने अपने हितों के मद्दे नजर, अमेरिका, चीन तथा पाकिस्तान तीनों ही चाहते थे कि भारत में एक स्थिर सरकार हो। वामपंथियों तथा तृणमूल के अपने अपने पूर्वाग्रहों के तथा सपा-बसपा के गठजोड़ के चलते, कांग्रेस के लिए स्थिर सरकार का गठन कर पाना असंभव था। ऐसे में अमेरिका तथा चीन की मांग को मानते हुए, तैयार की गई पटकथा के मंचन में चारों किरदारों के हितों की पूर्ति हो रही थी इसलिए मंचन के लिए हरी झंडी दे दी गई। पत्रकारों, एंकरों, रिटायर्ड जनरलों तथा नौकरशाहों, लेखकों तथा कलाकारों की पूरी फ़ौज, उन्मादकों के रूप में उन्माद पैदा करने के लिए तैयार बैठी थी। खाये-पिये-अघाये निम्न मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की फ़ौज भी, फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर आदि प्लेटफ़ॉर्म के जरिए, पैदा किये गये उन्माद को आम मतदाताओं तक पहुँचाने के लिए तैयार बैठी थी। पूंजी निवेश के लिए भाजपा ने चुनावी बॉंड के जरिए पर्याप्त धनराशि पहले ही जमा कर रखी थी। हरी झंडी मिलते ही, वैचारिक उत्पाद के प्रचार प्रसार के लिए सभी जी जान से जुट गये व तीन महीने में ही राष्ट्रवाद का उन्माद मतदाताओं के सर चढ़कर बोलने लगा और सारे बुनियादी मुद्दों की मांग नेपथ्य में चली गई। (18 फरवरी, 2019, फेसबुक ग्रुप पर मैंने लिखा था - पुलवामा में सीआरपीएफ़ के क़ाफ़िले पर हुए आतंकी हमले के संदर्भ से, 17 फरवरी 2019 रविवार को असम के लखीमपुर में भारतीय जनता युवा मोर्चा की रैली को संबोधित करते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि ‘सीआरपीएफ़ के चालीस जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जायेगी क्योंकि केंद्र में अब भाजपा की सरकार है’। उन्हें शायद याद नहीं रहा कि 1916 में पठानकोट में एयरफ़ोर्स बेस पर तथा उरी में सेना के ब्रिगेड हेडक्वार्टर पर आतंकी हमले के समय भी भाजपा की ही सरकार थी। या शायद उनकी शहादत इसलिए याद नहीं रही क्योंकि उनमें मारे गये जवानों तथा मारे गये आतंकियों का अनुपात अधिक नहीं था। या फिर शायद वे जानते हैं कि जनता की याददाश्त कमजोर होती है और उन्माद बढ़ जाने पर तर्कबुद्धि के साथ साथ स्मृति का ह्रास भी होता है।) और 26 फरवरी 2019 को बालाकोट पर सीमित हवाई हमला हो गया, अभिनंदन का हवाई जहाज़ मार गिराया गया और उन्हें बंदी बना लिया गया और फिर उसके बाद राष्ट्रवादी उन्माद की कोई सीमा न रही। नतीजे के रूप में पाँच साल के लिए चुनी गई स्थिर सरकार सामने है। पर उन्माद की परिणति स्खलन में होना एक प्राकृतिक नियम है, और फिर सामने मुँह बाये खड़े होंगे रोज़ी, रोटी, शिक्षा तथा स्वास्थ्य से जुड़े मूल मसले। आगे का रास्ता क्या होगा ये जानने के लिए दो साल इंतज़ार करना होगा। सुरेश श्रीवास्तव 4 जून 2019
( 2014 के चुनाव सोलहवीं लोकसभा के चुनाव नतीजों का मेरा पूर्वानुमान गलत साबित हुआ था और आत्मालोचना के रूप में मैंने मार्क्स दर्शन के ब्लॉग पर लेख लिखा था ‘सोलहवीं लोकसभा में प्रत्याशित जनादेश’ जिसमें मैंने रेखांकित किया था कि ‘इतिहास गवाह है कि हर पीढ़ी में जनता ने अपनी समस्यायों से निजात पाने के लिए इंदिरा गांधी, जयप्रकाश नारायन और वी.पी. सिंह जैसों को मसीहा बनाया, और फिर अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में उनको असफल पाकर उनको नकार कर इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया। मौजूदा दौर में भी जनता ने अन्ना हजारे, फिर अरविंद केजरीवाल और अंत में मोदी को अपना मसीहा बनाया है। जनता मसीहा ढूंढ रही थी, भाजपा अपनी आंतरिक कलह के बीच राजनीतिक स्वीकार्यता के लिए पार्टी के लिए नया चेहरा ढूंढ रही थी। नरेंद्र मोदी में भाजपा को अपना चेहरा मिल गया और जनता को अपना मसीहा। हाल फिलहाल जनता खुशफहमी में है कि नया मसीहा उसे निजात दिलायेगा। हमें वक्त का इंतजार करना होगा और नये मसीहा को समय देना होगा कि इतिहास उसका मूल्यांकन करे।’ http://marx-darshan.blogspot.com/2014/05/blog-post.html) सत्रहवीं लोकसभा के नतीजों से पहले भी मैं मानकर चल रहा था कि जिस परिपक्वता का परिचय राहुल गांधी दे रहे हैं तथा उनकी स्वीकार्यता बढ़ती जा रही, उससे लगता था कि कांग्रेस गठबंधन सरकार बनाने में सफल होगी, पर इस बार भी मेरा अनुमान गलत साबित हुआ। लेकिन इस बार ग़लती के कारण पिछली बार के मुकाबले में भिन्न हैं। महान दार्शनिक हेगेल का कहना था कि एक राजा, राजा इसलिए होता है क्योंकि प्रजा ऐसा सोचती है, और राजा यह जानता है। राजा की व्यक्तिगत चेतना तथा प्रजा की सामूहिक चेतना का यही द्वंद्वात्मक संबंध है। बुर्जुआ जनवाद में एक नेता, नेता इसलिए होता है क्योंकि जनता ऐसा सोचती है, और नेता यह जानता है। नेता के लिए यह जानना जरूरी है कि जनता किस तरह सोचती है तथा उसके लिए यह भी जरूरी है कि वह इस प्रकार आचरण करे कि जनता सोचने लगे कि एकमात्र वही नेता होने योग्य है। मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी को 2019 के चुनाव में भारी बहुमत से दोबारा सरकार की बागडोर सौंपी है क्योंकि इस समय भारतीय मतदाताओं की नजरों में वे सरकार को नेतृत्व प्रदान करने के लिए सबसे अधिक सक्षम तथा योग्य व्यक्ति हैं। दर्जनों राजनीतिक पार्टियों तथा अस्मिता की राजनीति के चलते छोटे छोटे समूहों में विभाजित मतदाताओं ने, किस मानसिकता के कारण एकमत से निर्णय लिया कि नरेंद्र मोदी ही सरकार की बागडोर संभालने के लिए सबसे योग्य व्यक्ति हैं, इसकी पड़ताल जरूरी है। भारतीय अर्थव्यवस्था सामंतवाद तथा पूँजीवाद के जिस संक्रमण काल में है तथा संशोधनवादियों ने राजनीतिक-अर्थशास्त्र के मूलभूत सिद्धांत (मार्क्सवाद) के बारे में जिस प्रकार का भ्रम फैला रखा है, उसमें समाजवाद की दुहाई देनेवाली अनेकों पार्टियों की मौजूदगी तथा उनका अस्मिता की राजनीति करना स्वभाविक है। स्वभाविक रूप से आम आदमी के लिए जीवनोपयोगी वस्तुओं की उपलब्धता सबसे अहम मसला होता है जिसके आधार पर व्यक्ति की अनभिज्ञ-चेतना तथा समूह की भौतिक-सामाजिक-चेतना का निर्माण होता है। तार्किक रूप से व्यक्ति का दीर्घकालिक आचरण मूल रूप से उसके जीवन से जुडी गतिविधियों अर्थात उसके आर्थिक हितों की पूर्ति से निर्धारित होता है। पर तीव्र उन्माद की स्थिति में व्यक्ति की तर्कबुद्धि जड़ हो जाती है और व्यक्ति का आचरण नियमित न होकर अनियमित हो जाता है। जो बात व्यक्ति पर लागू होती है वही समूह पर भी लागू होती है। घरेलू अर्थव्यवस्था के स्तर पर पिछले साढ़े चार साल में नरेंद्र मोदी की सरकार ऐसी कोई सफलता हासिल नहीं कर सकी जिसके आधार पर उन्हें 2019 के चुनाव में बहुमत हासिल हो पाता। बल्कि जनवरी आते आते सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा प्राप्त ख़बरों से भाजपा को समझ आ गया था कि अगर जल्दी ही जनता को उन्माद की हद तक उत्तेजित नहीं किया गया तथा शांत चित्त के साथ वोट देने दिया गया तो कॉंग्रेस के मुकाबले में भाजपा की हार निश्चित है। संघ परिवार हिंदु-मुसलमान वैमनस्य, लव जिहाद, गोहत्या, बाबरी मस्जिद, असम में नागरिक पंजीकरण आदि के नाम पर धार्मिक ध्रुवीकरण कराने तथा उत्तेजना को उन्माद के स्तर तक भड़काने में नाकाम हो रहा था। सर्वधर्म समभाव की मानसिकता वाले व्यापक हिंदु समाज को धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करके उन्माद की हद तक उत्तेजित कर पाना असंभव है। धार्मिक कट्टरपन के आधार पर मध्यवर्ग के एक हिस्से को दंगे करने की हद तक उत्तेजित कर पाना तो संभव है, पर व्यापक हिंदु समाज को लंबे समय तक उन्मादित रख पाना असंभव था। और अर्थव्यवस्था तथा सांप्रदायिक सौहार्द के मामले में विपक्ष काफी हद तक भाजपा सरकार को घेर पाने में कामयाब नजर आ रहा था। नरेंद्र मोदी के मुकाबले में राहुल गांधी की जनप्रियता भी बढ़ती जा रही थी। राहुल गांधी परिपक्वता दिखाते हुए क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ कर पाने में भी कामयाबी की तरफ बढ़ते नजर आ रहे थे। अस्मिता की राजनीति के चलते अनेकों समूहों में बंटा भारतीय मतदाता मानसिक संतुलन की स्थिति में, नोटबंदी के कारण जीडीपी में हुई गिरावट, जीएसटी की उँची दरों तथा काग़ज़ी कार्यवाही के झमेलों के कारण होनेवाली परेशानी तथा बेरोज़गारी जैसे अहम मसलों को नजरंदाज करते हुए, विवेकपूर्ण निर्णय के साथ भाजपा को वोट देगा ये कल्पनातीत था। खंडित जनादेश की दशा में भाजपा के लिए फिर से सरकार बना पाना असंभव होता। ऐसे में कट्टर राष्ट्रवाद ही एक ऐसा विचार हो सकता था जिसके आधार पर व्यापक मतदाता को कुछ समय तक तीव्र उन्माद की मनःस्थिति में रखा जा सकता था। और फरवरी से चुनाव होने तक इस उन्माद को हवा देने तथा बरक़रार रखने के लिए राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में सारे अवयव मौजूद थे। पिछले तीन साल से जेएनयू के कुछ छात्रों के खिलाफ टुकड़े टुकड़े गैंग के आरोप लग ही रहे थे, ऐसे में वामपंथ ने अपनी अवसरवादी नीति के चलते कन्हैया कुमार को केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। कश्मीर में आतंकवाद तथा धारा 370 से संबंधित उन्माद का उत्पादन करने वाले उत्पादक निरंतर उन्माद पैदा करने के लिए मीडिया में अंतहीन बहसें चला ही रहे थे। जितना ज्यादा कन्हैया कुमार के नारे ‘आजादी लेके रहेंगे’ को प्रचारित प्रसारित किया जा रहा था उतना ही संघ परिवार का राष्ट्रवाद के नाम पर खड़ा किया गया विभाजन तीव्र होता जा रहा था। इस माहौल में राहुल गांधी के रोजगार तथा आर्थिक उत्पादन के तर्कपूर्ण बयानों की प्रत्यक्षता आच्छादित होते जाना स्वाभिक था, जबकि कांग्रेस के अपने दिग्गज नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ने के अति उत्साह में, अपने रणक्षेत्र को छोड़ कर, भाजपा द्वारा रचे जा रहे चक्रव्यूह में जा कर लड़ने पर आमादा थे। आंतरिक अर्थव्यवस्था तथा मध्य एशिया तथा सुदूर पूर्व की राजनीतिक व्यवस्था के मोर्चे पर असफलता के कारण अमेरिकी प्रशासन कट्टर राष्ट्रवादी भावनाओं को उभारकर जनमत अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रहा था।अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन के द्वारा पेश चुनौतियों के कारण भारत तथा अमेरिका दोनों के हित में था कि अंधराष्ट्रवाद के उन्माद को ज्यादा से ज्यादा हवा दी जाये। मसूद अज़हर को प्रतिबंधित करने का मसला कई महीनों से सुलग रहा था। ऐसे में पुलवामा पर हमले ने उचित माहौल तैयार कर पर्याप्त विस्फोटक सामग्री भी मुहैया करा दी थी। बस जरूरत थी पलीत लगाने की जिसके लिए अमेरिकी सहयोग तथा सहमति पहली शर्त थी। पटकथा तैयार की गई कि घटनाक्रम को इस प्रकार अंजाम दिया जाय कि यह दर्शाया जा सके कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की नकेल कसने के लिए जिस दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है वह केवल नरेंद्र मोदी के पास ही है और चीन तथा पाकिस्तान के गठजोड़ के खिलाफ भारत की संप्रभुता तथा अखंडता को बचा कर रखने की क्षमता लौह पुरुष नरेंद्र मोदी के अलावा और किसी में नहीं है। इसके लिए पुलवामा पर हुए हमले के बदले पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी शिवर पर हमले के लिए अमेरिका की सहमति तथा मसूद अज़हर को प्रतिबंधित करने के लिए चीन की सहमति आवश्यक थी। पटकथा के सफल मंचन के लिए अमेरिका तथा चीन की सहमति तथा सहयोग आवश्यक था, पर सहयोग हासिल करने के लिए कुछ न कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती। मध्य एशिया में अमेरिका अपना रणनीतिक बर्चस्व बरक़रार रखना चाहता है और उसकी मांग थी कि ईरान के खिलाफ अमेरिका द्वारा लगाये गये प्रतिबंधों को प्रभावी बनाने के लिए भारत को ईरान से तेल लेना बंद कर अमेरिका से तेल लेना होगा। चीन मध्य एशिया से लेकर दक्षिणपूर्व एशिया तक शांति तथा सहयोग के लिए गंभीरता से प्रयास करता रहा है, क्योंकि यह उसकी महत्वाकांक्षी ओबीओआर सिल्क रूट योजना की सफलता के लिए बहुत जरूरी है। चीन की मांग थी कि दोनों ओर से कोई भी सामरिक कार्यवाही करते समय संयम बरता जाय तथा पुलवामा पर हुए हमले के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार न ठहराया जाय। अपने अपने हितों के मद्दे नजर, अमेरिका, चीन तथा पाकिस्तान तीनों ही चाहते थे कि भारत में एक स्थिर सरकार हो। वामपंथियों तथा तृणमूल के अपने अपने पूर्वाग्रहों के तथा सपा-बसपा के गठजोड़ के चलते, कांग्रेस के लिए स्थिर सरकार का गठन कर पाना असंभव था। ऐसे में अमेरिका तथा चीन की मांग को मानते हुए, तैयार की गई पटकथा के मंचन में चारों किरदारों के हितों की पूर्ति हो रही थी इसलिए मंचन के लिए हरी झंडी दे दी गई। पत्रकारों, एंकरों, रिटायर्ड जनरलों तथा नौकरशाहों, लेखकों तथा कलाकारों की पूरी फ़ौज, उन्मादकों के रूप में उन्माद पैदा करने के लिए तैयार बैठी थी। खाये-पिये-अघाये निम्न मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की फ़ौज भी, फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर आदि प्लेटफ़ॉर्म के जरिए, पैदा किये गये उन्माद को आम मतदाताओं तक पहुँचाने के लिए तैयार बैठी थी। पूंजी निवेश के लिए भाजपा ने चुनावी बॉंड के जरिए पर्याप्त धनराशि पहले ही जमा कर रखी थी। हरी झंडी मिलते ही, वैचारिक उत्पाद के प्रचार प्रसार के लिए सभी जी जान से जुट गये व तीन महीने में ही राष्ट्रवाद का उन्माद मतदाताओं के सर चढ़कर बोलने लगा और सारे बुनियादी मुद्दों की मांग नेपथ्य में चली गई। (18 फरवरी, 2019, फेसबुक ग्रुप पर मैंने लिखा था - पुलवामा में सीआरपीएफ़ के क़ाफ़िले पर हुए आतंकी हमले के संदर्भ से, 17 फरवरी 2019 रविवार को असम के लखीमपुर में भारतीय जनता युवा मोर्चा की रैली को संबोधित करते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि ‘सीआरपीएफ़ के चालीस जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जायेगी क्योंकि केंद्र में अब भाजपा की सरकार है’। उन्हें शायद याद नहीं रहा कि 1916 में पठानकोट में एयरफ़ोर्स बेस पर तथा उरी में सेना के ब्रिगेड हेडक्वार्टर पर आतंकी हमले के समय भी भाजपा की ही सरकार थी। या शायद उनकी शहादत इसलिए याद नहीं रही क्योंकि उनमें मारे गये जवानों तथा मारे गये आतंकियों का अनुपात अधिक नहीं था। या फिर शायद वे जानते हैं कि जनता की याददाश्त कमजोर होती है और उन्माद बढ़ जाने पर तर्कबुद्धि के साथ साथ स्मृति का ह्रास भी होता है।) और 26 फरवरी 2019 को बालाकोट पर सीमित हवाई हमला हो गया, अभिनंदन का हवाई जहाज़ मार गिराया गया और उन्हें बंदी बना लिया गया और फिर उसके बाद राष्ट्रवादी उन्माद की कोई सीमा न रही। नतीजे के रूप में पाँच साल के लिए चुनी गई स्थिर सरकार सामने है। पर उन्माद की परिणति स्खलन में होना एक प्राकृतिक नियम है, और फिर सामने मुँह बाये खड़े होंगे रोज़ी, रोटी, शिक्षा तथा स्वास्थ्य से जुड़े मूल मसले। आगे का रास्ता क्या होगा ये जानने के लिए दो साल इंतज़ार करना होगा। सुरेश श्रीवास्तव 4 जून 2019
Monday, 8 April 2019
Labour theory of Value and Surplus value
Thursday, 21 March 2019
Correct question begets correct answer
Asking the correct questions can give the correct answers .A lot of din and pandemonium is created these days exhorting people to usher in a 'Socialist Revolution .' But the phrase 'Socialist Revolution' means different things to different people even to the extent that, there are as many number of Socialisms as the number of its proponents . Inspite of beating the drum about 'an alternative narrative' , 'a new paradigm' etc many of the proponents are not able to give much details and nuances about what the 'alternative narrative ' and the 'new paradigm' .
A) In defence to their inability to give out much details , the logic given out is that there are no readymade and all weather solutions to the problems and that problems need to be accessed based on the time period and region where the change is to be usherd in to provide the nitty gritties of the new paradigm .The same is a valid fact, but the same doesn't mean that there can't be and there shouldn't be planning and working out of the fine details (based on the specific time period and specific region ) of what ought to happen once the 'socialist revolution' is usherd in .
B)Another aspect that is put forward is that it is not possible to preconceive and predict with perfection and absolute certainty about the course of action that is to be taken . The same also a fact worth reckoning but that cannot by any stretch of imagination made to propose that planning is not possible .To juxtapose prediction with planning is a logical folly . Planning ,preconception and conceptualisation of the alternative path forward should be made to the maximum extent possible (of cours,e with the disclaimer regarding the assumptions made and the possibilities of errors) based on the historical experiences (and the information derived from the same) available as on date and by taking into consideration the specific context of the time period and the region . The effectiveness of the plan can be judged and should be judged during the course of execution(praxis / practice) of the same and the outcomes achieved shall be compared with the desired outcomes and new inferences and course corrections ought to be made in the future course and the same shall proceed all along .
C)Some others put forward the argument that knowledge comes through practice and experience and the fine details can evolve only in the course of action . That knowledge doesn't arise from contemplation , meditation and speculation alone is true, and ,on the contrary knowledge is created based on the observations made based on the past experiences obtained from the course of action (practice/ praxis) and verifying the reproducibility and replaceability of the the knowledge and making the necessary updations and modifications in the future and the process goes on and infinitum .But it is to be taken note of the fact that for a particular generation to start a course of action the knowledge available can be obtained only from past experiences ,and not to draw the correct inferences and conclusions based on the observations made on the past observation through the 'scientific method' (the scientific method is stressed ) is again a flawed way of decision making .
D) The argument that discussions ,debates and other activities regarding the alternative path is just a delaying tactic and that it just tries to postpone sine die the inevitable course of action by stressing too muçh on' interpreting the world' rather than on 'changing the world ' are ignoring the Scientific method which is characterized by a)
Identification of the objective of study , b) observations of relevant facts based on past experienceand practice c) drawing primary inferences from the observations made (hypothesis) d) Verification of the applicability and the validity of the hypothesis in varying conditions and making the necessary updations to the hypothesis based on the verification e) Establishment of the Scientific theory based on the above steps .It is this scientific method that has helped mankind to accomplish what it has achieved so far . The same is applicable for the argument that efforts in finalising the future path of action before hand is futile .Those who are enamoured and infatuated by the idea of equality and justice and are in the urge to usher in the socialist revolution shall keep in mind that by ignoring the Scientific method and directly plunging into action may lead to a situation where the protagonists end up in rocking the boat of the very revolution (abrupt qualitative change) they try to bring forth and will further make life miserable for the very same people for whom they vouch to fight for .
The following are some train of thoughts that are enumerated in interrogative form for the proponents of the Socialist Revolution to reflect upon and to bring before public domain their views on the same so that the inquisitive and uninitiated individuals can get an idea of the same .These train of thoughts or queries are not exhaustive and complete .All others are encouraged to add further aspects for which they feel that clarification is required from the proponents of the socialist revolution
1) Will there be any change in the production process in the Socialist Stage and in the Capitalist mode
2) Will the pace of automation and Mechanisation increased in the Socialist stage
3)Will the intrest of the micro , small , medium
enterprises and the peasents with small land holdings be protected in the Socialist Stage .Or will the pace of proliterisation of the aforementioned group of people along with all those who are involved in self employment be accelerated in the socialist stage .
4) Will there be private ownership in the Socialist Stage
5) Will there be any change in the state machinery and its control in the Socialist stage and in Capitalism
6) The focus in the Socialist stage will be on the enhancement of production or will the thrust be in distribution and distributive justice
8)Will there be any change in the level of the individual worker, with respect to the working conditions and standard of living in the socialist stage and the Capitalism
9) What will be the intent of production in socialism ,will it be profit through exchage or will it be the production for use (In other words will commodity production hold sway in Socialist Stage)
10) Will the Percentage of population engaged in agriculture increase in the Socialist stage or will it get reduced
11) Will the pace of urbanisation increase in the socialist stage or will it get reduced .
12) Can the welfare policies that are implemented in the advanced nations (Scandinavia ,Canada typical examples) be part of the Socialist stage .In other words how the socialist state differs from the welfare states of the aforementioned nations
13) Will labour intensive production techniques be promoted in socialism or will capital intensive production techniques be promoted
14) Will global rate of return on capital have any significance in the Socialist stage
15) The policy of taxing the rich and wealthy for helping the toiling masses be a policy paradigm in the socialist stage
16) What will be the primary focus of government expenditure in the socialist stage will it be on infrastructure build up like roads ,bridges ,rail network ,ports ,powerplants ,local and long distance transport networks or will it be on social sector spending like education , health care etc
17) Will there be tarifs and duties for trans national trade in the socialist stage
18) Will there be restrictions on the investment from outside the geographical boundaries of the nation state in the socialist stage
19) Will there be freedom of religion during the socialist stage
20) Will the relationship between other nations based on moral ,ethical and ideological doctrine or will it be based on the economic interests (trade ,commerce , investment)of the people of the nation
21) What will be the extent to which the freedom of expression (including the freedom of press) will be permitted in the socialist stage
Anoop Nobert
A) In defence to their inability to give out much details , the logic given out is that there are no readymade and all weather solutions to the problems and that problems need to be accessed based on the time period and region where the change is to be usherd in to provide the nitty gritties of the new paradigm .The same is a valid fact, but the same doesn't mean that there can't be and there shouldn't be planning and working out of the fine details (based on the specific time period and specific region ) of what ought to happen once the 'socialist revolution' is usherd in .
B)Another aspect that is put forward is that it is not possible to preconceive and predict with perfection and absolute certainty about the course of action that is to be taken . The same also a fact worth reckoning but that cannot by any stretch of imagination made to propose that planning is not possible .To juxtapose prediction with planning is a logical folly . Planning ,preconception and conceptualisation of the alternative path forward should be made to the maximum extent possible (of cours,e with the disclaimer regarding the assumptions made and the possibilities of errors) based on the historical experiences (and the information derived from the same) available as on date and by taking into consideration the specific context of the time period and the region . The effectiveness of the plan can be judged and should be judged during the course of execution(praxis / practice) of the same and the outcomes achieved shall be compared with the desired outcomes and new inferences and course corrections ought to be made in the future course and the same shall proceed all along .
C)Some others put forward the argument that knowledge comes through practice and experience and the fine details can evolve only in the course of action . That knowledge doesn't arise from contemplation , meditation and speculation alone is true, and ,on the contrary knowledge is created based on the observations made based on the past experiences obtained from the course of action (practice/ praxis) and verifying the reproducibility and replaceability of the the knowledge and making the necessary updations and modifications in the future and the process goes on and infinitum .But it is to be taken note of the fact that for a particular generation to start a course of action the knowledge available can be obtained only from past experiences ,and not to draw the correct inferences and conclusions based on the observations made on the past observation through the 'scientific method' (the scientific method is stressed ) is again a flawed way of decision making .
D) The argument that discussions ,debates and other activities regarding the alternative path is just a delaying tactic and that it just tries to postpone sine die the inevitable course of action by stressing too muçh on' interpreting the world' rather than on 'changing the world ' are ignoring the Scientific method which is characterized by a)
Identification of the objective of study , b) observations of relevant facts based on past experienceand practice c) drawing primary inferences from the observations made (hypothesis) d) Verification of the applicability and the validity of the hypothesis in varying conditions and making the necessary updations to the hypothesis based on the verification e) Establishment of the Scientific theory based on the above steps .It is this scientific method that has helped mankind to accomplish what it has achieved so far . The same is applicable for the argument that efforts in finalising the future path of action before hand is futile .Those who are enamoured and infatuated by the idea of equality and justice and are in the urge to usher in the socialist revolution shall keep in mind that by ignoring the Scientific method and directly plunging into action may lead to a situation where the protagonists end up in rocking the boat of the very revolution (abrupt qualitative change) they try to bring forth and will further make life miserable for the very same people for whom they vouch to fight for .
The following are some train of thoughts that are enumerated in interrogative form for the proponents of the Socialist Revolution to reflect upon and to bring before public domain their views on the same so that the inquisitive and uninitiated individuals can get an idea of the same .These train of thoughts or queries are not exhaustive and complete .All others are encouraged to add further aspects for which they feel that clarification is required from the proponents of the socialist revolution
1) Will there be any change in the production process in the Socialist Stage and in the Capitalist mode
2) Will the pace of automation and Mechanisation increased in the Socialist stage
3)Will the intrest of the micro , small , medium
enterprises and the peasents with small land holdings be protected in the Socialist Stage .Or will the pace of proliterisation of the aforementioned group of people along with all those who are involved in self employment be accelerated in the socialist stage .
4) Will there be private ownership in the Socialist Stage
5) Will there be any change in the state machinery and its control in the Socialist stage and in Capitalism
6) The focus in the Socialist stage will be on the enhancement of production or will the thrust be in distribution and distributive justice
8)Will there be any change in the level of the individual worker, with respect to the working conditions and standard of living in the socialist stage and the Capitalism
9) What will be the intent of production in socialism ,will it be profit through exchage or will it be the production for use (In other words will commodity production hold sway in Socialist Stage)
10) Will the Percentage of population engaged in agriculture increase in the Socialist stage or will it get reduced
11) Will the pace of urbanisation increase in the socialist stage or will it get reduced .
12) Can the welfare policies that are implemented in the advanced nations (Scandinavia ,Canada typical examples) be part of the Socialist stage .In other words how the socialist state differs from the welfare states of the aforementioned nations
13) Will labour intensive production techniques be promoted in socialism or will capital intensive production techniques be promoted
14) Will global rate of return on capital have any significance in the Socialist stage
15) The policy of taxing the rich and wealthy for helping the toiling masses be a policy paradigm in the socialist stage
16) What will be the primary focus of government expenditure in the socialist stage will it be on infrastructure build up like roads ,bridges ,rail network ,ports ,powerplants ,local and long distance transport networks or will it be on social sector spending like education , health care etc
17) Will there be tarifs and duties for trans national trade in the socialist stage
18) Will there be restrictions on the investment from outside the geographical boundaries of the nation state in the socialist stage
19) Will there be freedom of religion during the socialist stage
20) Will the relationship between other nations based on moral ,ethical and ideological doctrine or will it be based on the economic interests (trade ,commerce , investment)of the people of the nation
21) What will be the extent to which the freedom of expression (including the freedom of press) will be permitted in the socialist stage
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